भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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खण्ड ४ मन्त्र ४७ १०३ मूँदना आदि कूर्म नामक वायु की प्रेरणा से सम्पन्न होता है। कृकर (कृकल) नामक वायु के द्वारा भूख-प्यास की इच्छा होती है तथा तन्द्रा-आलस्य देवदत्त वायु का कार्य कहा गया है॥ ३२-३४॥ सुषुम्नायाः शिवो देव इडाया देवता हरिः। पिङ्गलाया विरञ्चिः स्यात्सरस्वत्या विराण्मुने॥ पूषाधिदेवता प्रोक्तो वरुणा वायुदेवता। हस्तिजिह्वाभिधायास्तु वरुणो देवता भवेत्॥३६॥ हे मुनीश्वर ! सुषुम्ना नाड़ी के अधिष्ठाता देव शिव और इड़ा के देवता विष्णु तथा पिङ्गला नाड़ी के देवता भगवान् ब्रह्माजी हैं। सरस्वती नाड़ी के देवता विराट् हैं। पूषा नाड़ी के देवता पूषा नाम से युक्त आदित्य हैं। वरुणा के वायु देवता हैं। हस्तिजिह्वा नाड़ी के देवता वरुण हैं॥ ३५-३६॥ यशस्विन्या मुनिश्रेष्ठ भगवान्भास्करस्तथा। अलम्बुसाया अम्ब्वात्मा वरुणः परिकीर्तितः॥ कुहोः क्षुद्देवता प्रोक्ता गान्धारी चन्द्रदेवता। शङ्खिन्याश्चन्द्रमास्तद्वत्पयस्विन्याः प्रजापतिः ॥३८॥ हे श्रेष्ठ मुने ! भगवान् भास्कर यशस्विनी नाड़ी के देवता हैं। अलम्बुसा नाड़ी के देवता भी जलस्वरूप वरुण कहे गये हैं। कुहू नाड़ी की अधिष्ठात्री क्षुधा देवी हैं। गान्धारी के देवता चन्द्रमा हैं। ऐसे ही शंखिनी नाड़ी के देवता भी चन्द्रमा को कहा गया है। पयस्विनी नामक नाड़ी के देवता प्रजापति हैं॥ ३७-३८॥ विश्वोदराभिधायास्तु भगवान्पावकः पतिः। इडायां चन्द्रमा नित्यं चरत्येव महामुने ॥ ३९॥ पिङ्गलायां रविस्तद्वन्मुने वेदविदां वर। पिङ्गलायामिडायां तु वायोः संक्रमणं तु यत् ॥ ४० ॥ तदुत्तरायणं प्रोक्तं मुने वेदान्तवेदिभिः। इडायां पिङ्गलायां तु प्राणसंक्रमणं मुने ॥ ४१ ॥ दक्षिणायनमित्युक्तं पिङ्गलायामिति श्रुतिः। इडापिङ्गलयोः संधिं यदा प्राणः समागतः ॥४२॥ अमावास्या तदा प्रोक्ता देहे देहभृतां वर। विश्वोदरा नाड़ी के देवता भगवान् अग्निदेव हैं। हे वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ महर्षे ! चन्द्रमा देवता सदा ही इड़ा नामक नाड़ी में और सूर्य देवता पिङ्गला नाम वाली नाड़ी में संचरित होते हैं। पिङ्गला नाड़ी से इड़ा नाड़ी में जो संवत्सरात्मक प्राणमय सूर्य का संक्रमण होता है, उसे विद्वज्जन महर्षियों ने उत्तरायण की संज्ञा प्रदान की है। इसी भाँति इड़ा से पिङ्गला में जो प्राणमय सूर्य का संक्रमण होता है, उसे दक्षिणायन के नाम से व्यक्त किया है। जब प्राण इड़ा और पिङ्गला की संधि में गमन करता है, तब उस समय हे महर्षे ! इस देह के अन्दर अमावस्या कही गयी है॥ ३९-४२॥ मूलाधारं यदा प्राणः प्रविष्टः पण्डितोत्तम ॥ ४३ ॥ तदाद्यं विषुवं प्रोक्तं तापसैस्तापसोत्तम। प्राणसंज्ञो मुनिश्रेष्ठ मूर्धानं प्राविशद्यदा॥ ४४॥ तदन्यं विषुवं प्रोक्तं तापसैस्तत्त्वचिन्तकैः। निःश्वासोच्छ्वासनं सर्व मासानां संक्रमो भवेत् ॥ ४५ ॥ इडायाः कुण्डलीस्थानं यदा प्राणः समागतः। सोमग्रहणमित्युक्तं तदा तत्त्वविदां वर ॥ ४६ ॥ यदा पिङ्गलया प्राणः कुण्डलीस्थानमागतः। तदा तदा भवेत्सूर्यग्रहणं मुनिपुङ्गव ॥ ४७॥ जब प्राण मूलाधार में प्रविष्ट होता है, तब हे विद्वद्वर ! तपस्वियों ने आद्य विषुव नामक योग का प्राकट्य कहा है। हे श्रेष्ठ मुने ! जब प्राणवायु सहस्रार चक्र में प्रविष्ट होता है, तब उस समय श्रेष्ठ तत्त्व का विचार करते हुए महान् ऋषियों ने अन्तिम विषुव योग की स्थिति कही है। सभी उच्छ्वास एवं निःश्वास मास-संक्रान्ति माने गये हैं। हे तत्त्वज्ञ शिरोमणे ! जब प्राण इड़ा नाड़ी के माध्यम से कुण्डलिनी के पास आ जाता है, तब उस समय को चन्द्रग्रहण-काल कहा जाता है। ठीक ऐसे ही जब प्राण पिङ्गला नाड़ी के माध्यम से कुण्डलिनी के क्षेत्र में आता है, तभी हे मुने ! सूर्य ग्रहण का समय होता है॥ ४३-४७॥