१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ५ मन्त्र ६ १०५ शिवमात्मनि पश्यन्ति प्रतिमासु न योगिनः । अज्ञानां भावनार्थाय प्रतिमाः परिकल्पिताः ॥५९ योगी मनुष्य अपनी आत्मा में ही भगवान् शिव का दर्शन करते हैं, प्रस्तर खण्ड एवं काष्ठ से विनिर्मित प्रतिमाओं में नहीं। अज्ञानी मनुष्यों के हृदयों में भगवान् शिव के प्रति भावना जाग्रत् करने के लिए ही प्रतिमाओं की कल्पना की गयी है॥५९॥ अपूर्वमपरं ब्रह्म स्वात्मानं सत्यमद्वयम्। प्रज्ञानघनमानन्दं यः पश्यति स पश्यति ॥६०॥ नाडीपुञ्जं सदाऽसारं नरभावं महामुने। समुत्सृज्यात्मनाऽऽत्मानमहमित्येव धारय ॥६१॥ जिससे भिन्न न कोई पूर्व (कारण) है और न ही पर (कार्य) ही है। जो सत्यस्वरूप, अनुपम और प्रज्ञान घनस्वरूप है,ऐसे उस आनन्दमय ब्रह्म को जो स्वयं अपने आत्मा के रूप में दृष्टिपात करता है,वही वास्तव में यथार्थ देखता है। हे महामुने ! यह मानव शरीर नाड़ियों का समुदाय मात्र है,जो सदा ही सारहीन है। इसके प्रति आत्मभाव का परित्याग करके बुद्धि के द्वारा यह निश्चय करो कि मैं स्वयं ही परमात्म स्वरूप हूँ॥ अशरीरं शरीरेषु महान्तं विभुमीश्वरम्। आनन्दमक्षरं साक्षान्मत्वा धीरो न शोचति ॥ ६२ ॥ विभेदजनके ज्ञाने नष्टे ज्ञानबलान्मुने। आत्मनो ब्रह्मणो भेदमसन्तं किं करिष्यति ॥६३॥ जो इस शरीर में रहकर भी इससे सदा ही पृथक् है, महान् है, व्यापक है तथा सभी का ईश्वर है, उस आनन्दस्वरूप शाश्वत परमात्म तत्त्व को जानकर बुद्धिमान् धीर पुरुष कभी भी शोक को नहीं प्राप्त होता। हे श्रेष्ठ मुने! सद्ज्ञान के बल से भेदजनक अज्ञान का विनाश हो जाने पर कौन आत्मा एवं ब्रह्म में मिथ्या भेद की बात कहेगा ॥ ६२-६३ ॥ ॥ पञ्चमःखण्डः ॥ यहाँ आत्मशोधन की विधि कही जा रही है- सम्यक्कथय मे ब्रह्मन्नाडीशुद्धिं समासतः। यथा शुद्ध्यो सदा ध्यायञ्जीवन्मुक्तो भवाम्य-हम् ॥१॥ साङ्कृति ने भगवान् दत्तात्रेय जी से पुनः प्रश्न किया- 'हे ब्रह्मन् ! नाड़ी शोधन की क्या प्रक्रिया है, यह मुझे ठीक तरह से एवं अति संक्षेप में बताइये, जिससे कि मैं नाड़ी शुद्धिपूर्वक सदा ही परमात्मतत्त्व का ध्यान करते हुए इस जीवन से मुक्ति प्राप्त कर सकूँ ॥ १॥' सांकृते शृणु वक्ष्यामि नाडीशुद्धिं समासतः। विध्युक्तकर्मसंयुक्तः कामसंकल्पवर्जितः ॥२॥ तब भगवान् दत्तात्रेय जी ने कहा-हे साङ्कृते ! मैं अति संक्षेप से नाड़ी शुद्धि का वर्णन आपके सम्मुख करता हूँ। शास्त्रादि के विधि वाक्यों द्वारा जो भी कर्म कहे गये हैं, उनके प्रति कर्त्तव्य बुद्धि से संलग्न रहना चाहिए। कामना एवं फलप्राप्ति के संकल्प को त्याग देना चाहिए ॥ २ ॥ यमाद्यष्टाङ्गसंयुक्तः शान्तः सत्यपरायणः। स्वात्मन्यवस्थितः सम्यग्ज्ञानिभिश्च सुशिक्षितः ॥३॥ योग के यम आदि आठों अंगों का उपयोग करते हुए शान्त एवं सत्य परायण रहना चाहिए। अपने आत्मा के ध्यान में सतत लगा रहे तथा ज्ञानी विद्वज्जनों की सेवा में उपस्थित होकर उनसे भली-भाँति शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए ॥ ३ ॥ पर्वताग्रे नदीतीरे बिल्वमूले वनेऽथवा। मनोरमे शुचौ देशे मठं कृत्वा समाहितः ॥ ४॥ आरभ्य चासनं पश्चात्प्राङ्मुखोदङ्मुखोऽपि वा। समग्रग्रीवशिरः कायः संवृतास्यः सुनिश्चलः ॥ नासाग्रे शशभृद्विम्बे बिन्दुमघ्ये तुरीयकम्। स्रवन्तममृतं पश्येन्नेत्राभ्यां सुसमाहितः ॥ ६ ॥