१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०८ जाबालदर्शनोपनिषद् प्राणसंयमनेनैव ज्ञानान्मुक्तो भविष्यति। बाह्यादापूरणं वायोरुदरे पूरको हि सः॥१२॥ संपूर्णकुम्भवद्वायोर्धारणं कुम्भको भवेत्। बहिर्विरेचनं वायोरुदराद्रेचकः स्मृतः॥१३॥ एक वर्ष तक लगातार ऊपर कही हुई विधि से प्राणायाम करने से साधक को अविनाशी ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाता है। अतः प्राणायाम का नित्य ही अभ्यास किया जाना चाहिए। जो पुरुष योग के अभ्यास में संलग्न रहकर सदैव अपने धर्म के पालन में लगा रहता है। वह पुरुष प्राणायाम के द्वारा ही सद्ज्ञान रूपी प्रकाश को प्राप्त करके संसार-सागर से मुक्त हो जाता है। वायु को बाहर से खींचकर उदर के भीतर भरे जाने की प्रक्रिया को पूरक कहा गया है। जल से परिपूर्ण कुम्भ की भाँति वायु को उदर में स्थिर किये रहना ही कुम्भक कहा जाता है और उसे फिर उदर से बाहर निकालने की क्रिया को रेचक कहा जाता है॥११-१३॥ प्रस्वेदजनको यस्तु प्राणायामेषु सोऽधमः। कम्पनं मध्यमं विद्यादुत्थानं चोत्तमंविदुः ॥१४॥ पूर्वं पूर्वं प्रकुर्वीत यावदुत्थानसंभवः। संभवत्युत्तमे प्राज्ञः प्राणायामे सुखी भवेत् ॥१५॥ जिस प्राणायाम के करने से शरीर में पसीना आ जाए, उसे सभी प्राणायामों में निम्न श्रेणी का माना गया है। यदि प्राणायाम करते समय शरीर काँपने लगे, तो उसे मध्यम श्रेणी का प्राणायाम कहा गया है और यदि प्राणायाम के समय में देह ऊर्ध्व की ओर उठता हुआ-सा लगे, तो उसे उत्तम कोटि का माना गया है। जब तक ऊपर की ओर उठने की अनुभूति वाले प्राणायाम की सिद्धि प्राप्त न हो जाए, तब तक पूर्वोक्त विधि से दोनों तरह के प्राणायामों का ही अभ्यास करता रहे। उपर्युक्त उत्तम श्रेणी के प्राणायाम के पूर्ण हो जाने पर ज्ञानी मनुष्य सुखी हो जाता है॥१४-१५॥ प्राणायामेन चित्तं तु शुद्धं भवति सुव्रत। चित्ते शुद्धे शुचिः साक्षात्प्रत्यग्ज्योति व्यवस्थितः॥ प्राणाश्रितेन संयुक्तः परमात्मनि तिष्ठति। प्राणायामपरस्यास्य पुरुषस्य महात्मनः॥ १७॥ देहश्चोत्तिष्ठते तेन किंचिज्ज्ञानाद्विमुक्तता। रेचकं पूरकं मुक्त्वा कुम्भकं नित्यमभ्यसेत् ॥ १८॥ हे सुव्रत ! प्राणायाम के द्वारा चित्त पवित्र हो जाता है एवं उस पवित्र चित्त में अन्तः प्रकाशस्वरूप शुद्ध आत्म तत्त्व का धीरे-धीरे साक्षात्कार होने लगता है। प्राणायाम में सदा रत रहने वाले श्रेष्ठ पुरुष का प्राण चित्त के साथ संयुक्त होकर परमात्मा में स्थित हो जाता है और उसका शरीर क्रमशः धीरे-धीरे ऊपर को उठने लगता है। इस प्राणायाम से ज्ञान को प्राप्त करके वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है। रेचक एवं पूरक से मुक्त होकर विशेषरूप से कुम्भक का ही प्रतिदिन अभ्यास करना चाहिए॥ १६-१८॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः सम्यग्ज्ञानमवाप्नुयात्। मनोजवत्वमाप्नोति पलितादि च नश्यति ॥ १९॥ प्राणायामैकनिष्ठस्य न किंचिदपि दुर्लभम्। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन प्राणायामान्समभ्यसेत् ॥ २०॥ (इस प्रकार से नित्य प्राणायाम करने वाला योगी) सभी तरह के पापों से मुक्त होकर श्रेष्ठ ज्ञान प्राप्त कर लेता है। वह मनुष्य मन के सदृश वेगवान् एवं मनोजयी हो जाता है, बालों का पकना एवं अन्य दोष भी नष्ट हो जाते हैं। प्राणायाम में अटूट निष्ठा रखने वाले मनुष्य के लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं है। अतः मनुष्य को पूर्ण प्रयत्नशील रहते हुए प्राणायामों का अभ्यास करना चाहिए॥ १९-२०॥ विनियोगान्व्रवक्ष्यामि प्राणायामस्य सुव्रत। संध्ययोर्ब्राह्मकालेऽपि मध्याह्ने वाऽथवासदा ॥२१ बाह्यं प्राणं समाकृष्य पूरयित्वोदरेण च। नासाग्रे नाभिमध्ये च पादाङ्गुष्ठे च धारयेत् ॥ २२॥ हे सुव्रत ! अब हम प्राणायाम के विनियोग (विशेष प्रयोग) तुम्हें बतलाते हैं। दोनों सन्ध्याओं के समय में अथवा ब्राह्ममुहूर्त में या फिर मध्याह्न काल में सतत बाह्य क्षेत्र की प्राण वायु को अन्दर खींचकर उदर में