१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 111, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १० मन्त्र १३ १९५ मैं ही वह परमेश्वर हूँ, संसार के बन्धनों में पड़ा हुआ जीव नहीं हूँ, अतः मुझसे भिन्न किसी वस्तु का किसी भी काल में अस्तित्व नहीं रहा है। जिस प्रकार फेन और लहरें समुद्र से उठते ही फिर समुद्र में विलीन हो जाते हैं, उसी प्रकार यह जगत् मुझसे ही प्रकट होता है और मुझमें ही विलीन हो जाता है। इसलिए सृष्टि का कारणभूत मन भी मुझसे पृथक् नहीं है। इस जगत् और माया का भी मुझसे भिन्न अस्तित्व नहीं है ॥ ६-७॥ यस्यैवं परमात्माऽयं प्रत्यग्भूतः प्रकाशितः । स तु याति च पुंभावं स्वयं साक्षात्परा मृतम् ॥८ ॥ इस प्रकार से जिस पुरुष को यह परमात्मा अपनी आत्मा के रूप में अनुभव होने लगता है, वह परम पुरुषार्थरूप साक्षात् परम अमृतस्वरूप परमात्मभाव को प्राप्त कर लेता है ॥ ८ ॥ यदा मनसि चैतन्यं भाति सर्वत्रगं सदा । योगिनोऽव्यवधानेन तदा संपद्यते स्वयम् ॥ ९ ॥ यदा सर्वाणि भूतानि स्वात्मन्येव हि पश्यति । सर्वभूतेषु चात्मानं ब्रह्म संपद्यते तदा ॥ १० ॥ जिस समय योगी के मन में सर्वत्र व्यापक आत्म चैतन्यस्वरूप का अपरोक्ष रूप में अनुभव होने लगता है, तब उस समय वह स्वयं ही परमात्मस्वरूप में स्थापित हो जाता है। जब वह श्रेष्ठ ज्ञानी मनुष्य सब भूत- प्राणियों को अपने में ही अवलोकन करता है तथा अपने को ही सम्पूर्ण भूतों में प्रतिष्ठित देखता है, तब वह साक्षात् स्वयं ब्रह्मरूप ही हो जाता है ॥ ९-१० ॥ यदा सर्वाणि भूतानि समाधिस्थो न पश्यति । एकीभूतः परेणाऽसौ तदा भवतिकेवलः ॥११॥ यदा पश्यति चात्मानं केवलं परमार्थतः । मायामात्रं जगत्कृत्स्नं तदा भवति निर्वृतिः ॥१२॥ जब समाधिस्थ पुरुष परमात्मा से एकत्व प्राप्त करके अपने से अलग किसी भी भूत-प्राणी को नहीं देखता, तब वह केवल परमात्मरूप से ही प्रतिष्ठित हो जाता है। जब पुरुष केवल अपनी आत्मा को ही परमार्थ सत्यस्वरूप में देखता है, सम्पूर्ण विश्व को माया का विलास मात्र मानता है, तब वह परमानन्द को प्राप्त कर लेता है ॥ ११-१२ ॥ एवमुक्त्वा स भगवान्दत्तात्रेयो महामुनिः । सांकृतिः स्वस्वरूपेण सुखमास्तेऽतिनिर्भयः ॥१३ इस प्रकार महाज्ञानी भगवान् दत्तात्रेय जी उपदेश देकर मौन हो गये एवं मुनीश्वर सांकृति उस उपदेश को हृदयंगम करके अपने यथार्थ स्वरूप में स्थित एवं भयमुक्त होकर आनन्दपूर्वक रहने लगे ॥ १३ ॥ ॐ आप्यायन्तु................................ इति शान्तिः ॥ ॥ इति जाबालदर्शनोपनिषत्समाप्ता ॥