१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपदेश ३ मन्त्र ९० १३८ कर दे; क्योंकि इस ब्रह्मरूप सूत्र के धारण करने से परिव्राजक न तो कभी उच्छिष्ट (जूठा) होता है और न ही कभी अपवित्र होता है। सद्ज्ञान रूप यज्ञोपवीत धारण करने वाले जिन परिव्राजकों के अन्तःकरण में वह ब्रह्मरूप सूत्र प्रतिष्ठित है, वे ही इस जगत् में सूत्र के यथार्थ रूप को जानने वाले तथा यज्ञोपवीत धारण करने वाले हैं। परिव्राजक (संन्यासी) ज्ञानरूपी शिखा को धारण करते हैं, ज्ञान में ही प्रतिष्ठित होते हैं तथा ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत को ही धारण करते हैं। उन परिव्राजकों के लिए ज्ञान ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ होता है। ज्ञान को ही सबसे पवित्र कहा गया है। जिस तरह से अग्नि की शिखा उसके स्वरूप से अलग नहीं होती, उसी तरह जिस श्रेष्ठज्ञानी परिव्राजक ने ज्ञानरूपी शिखा को धारण कर रखा है, वही शिखाधारी कहा जाता है; दूसरे अन्य लोग जो मात्र केश को धारण करते हैं, वे वास्तविक शिखा को धारण करने वाले नहीं होते। जो ब्राह्मण आदि द्विज वैदिक कर्मादि के श्रेष्ठ अधिकारी माने जाते हैं, उन्हीं श्रेष्ठजनों को यह बाह्य सूत्र अर्थात् यज्ञोपवीत ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि वही कर्म का श्रेष्ठ अंग माना गया है। जिन परिव्राजकों के पास ज्ञानरूपी शिखा एवं ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत है, उसी परिव्राजक में पूर्णरूपेण ब्राह्मणत्व विद्यमान है। ब्रह्मज्ञानी जन ऐसा ही मानते हैं ॥ ८०-८९ ॥ तदेतद्विज्ञाय ब्राह्मणः परिव्रज्य परिव्राडेकशाटी मुण्डोऽपरिग्रहः शरीरक्लेशासहिष्णुश्चेदथवा यथाविधिश्चैजातरूपधरो भूत्वा सपुत्रमित्रकलत्राप्तबन्ध्वादीनि स्वाध्यायं सर्वकर्माणि संन्यस्यायं ब्रह्माण्डं च सर्वं कौपीनं दण्डमाच्छादनं च त्यक्त्वा द्वन्द्वसहिष्णुर्न शीतं न चोष्णं न सुखं न दुःखं न निद्रा न मानापमाने च षडूर्विवर्जितो निन्दाहंकारमत्सरगर्वदम्भेर्ष्यासूयेच्छाद्वेषसुखदुःख- कामक्रोधलोभमोहादीन्विसृज्य स्ववपुः शवाकारमिव स्मृत्वा स्वव्यतिरिक्तं सर्वमन्तर्बहिर्मन्य- मानः कस्यापि वन्दनमकृत्वा न नमस्कारो न स्वाहाकारो न स्वधाकारो न निन्दास्तुतिर्यादृच्छिको भवेद्यदृच्छालाभसंतुष्टः सुवर्णादीन्न परिग्रहेन्नावाहनं न विसर्जनं न मन्त्रं नामन्त्रं न ध्यानं नोपासनं न लक्ष्यं नालक्ष्यं न पृथक् नापृथक् न त्वन्यत्र सर्वत्रानिकेतः स्थिरमतिः शून्यागारवृक्षमूलदेवगृह तृणकूटकुलालशालाग्निहोत्रशालाग्निदिगन्तरनदीतटपुलिनभूगृहकन्दरनिर्झरस्थण्डिलेषु वने वा श्वेतकेतुऋभुनिदाघऋषभदुर्वासःसंवर्तकदत्तात्रेय रैवतकवदव्यक्तलिङ्गोऽव्यक्ताचारो बालो- न्मत्तपिशाचवदुन्मत्तोन्मत्तवदाचरंस्त्रिदण्डं शिक्यं पात्रं कमण्डलुं कटिसूत्रं कौपीनं च तत्सर्वं भूःस्वाहेत्यप्सु परित्यज्य ॥ ९० ॥ इस प्रकार से ब्राह्मण उपर्युक्त सभी नियमोपनियम जानकर घर का परित्याग करके संन्यासी हो जाए; मात्र एक ही वस्त्र धारण करे, सिर के बालों का मुण्डन करा ले तथा किसी भी तरह की वस्तुओं, पदार्थों आदि का संग्रह न करे। यदि वह शारीरिक क्लेशों को सहने में सक्षम न हो, तो उसे कौपीन (लँगोटी) धारण कर लेनी चाहिए और यदि शारीरिक क्लेशों-परेशानियों को सहने में समर्थ हो, तो विधिवत् संन्यास धर्म को ग्रहण कर वस्त्र रहित हो, जीवन-यापन करे। (वह) अपने मित्र, पुत्र, स्त्री, श्रेष्ठ गुरुजन एवं बन्धु-बान्धव, भाई आदि को त्यागकर विचरण करे। स्वाध्याय तथा वैदिक कर्मों के अनुष्ठान को छोड़कर सम्पूर्ण विश्व ब्रह्माण्ड के साथ अपना सम्बन्ध परित्याग कर दे। अपने पास कौपीन, दण्ड एवं अंगाच्छादन हेतु वस्त्रादि ही रखे। सभी तरह के द्वन्द्वों को पूर्णरूपेण सहन करते हुए सर्दी-गर्मी आदि पर ध्यान न दे; न कभी सुख को इच्छा करे और न ही कभी दुःख आदि द्वन्द्वों से परेशान हो। निद्रा की भी चिन्ता न करे। मान-अपमान में सदैव सम भाव से रहे। छहों प्रकार को ऊर्मियों से वह कभी भी प्रभावित न हो। निन्दा, मत्सर (डाह), अहंकार, गर्व, दम्भ, ईर्ष्या, दोष- दृष्टि, इच्छा, द्वेष, सुख-दुःख, काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि का परित्याग कर अपने शरीर को मृतवत् मानकर, आत्मा के अलावा दूसरी अन्य किसी भी वस्तु को बाह्य एवं अन्तः से स्वीकार न करते हुए कभी भी किसी के