१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपदेश ४ मन्त्र १२ १४० ॥ चतुर्थोपदेशः ॥ [ संन्यास-धर्म के पालन का महत्त्व एवं संन्यास-धर्म को धारण करने की शास्त्रीय विधि ] त्यक्त्वा लोकांश्च वेदांश्च विषयानिन्द्रियाणि च । आत्मन्येव स्थितो यस्तु स याति परमां गतिम् ॥ १ ॥ नामगोत्रादिवरणं देशं कालं श्रुतं कुलम् । वयो वृत्तं शीलं ख्यापयेन्नैव सद्यतिः ॥ २ ॥ न संभाषेत्स्त्रियं कांचि त्पूर्वदृष्टां च न स्मरेत् । कथां च वर्जयेत्तासां न पश्येल्लिखितामपि ॥ ३ ॥ एतच्चतुष्टयं मोहात्स्त्रीणामाचरतो यतेः । चित्तं विक्रियतेऽवश्यं तद्विकारात्प्रणश्यति ॥ ४ ॥ तृष्णा क्रोधोऽनृतं माया लोभमोहौ प्रियाप्रिये । शिल्पं व्याख्यानयोगश्च कामो रागपरिग्रहः ॥ ५ ॥ अहंकारो ममत्वं च चिकित्सा धर्मसाहसम् । प्रायश्चित्तं प्रवासश्च मन्त्रौषधपराशिषः । प्रतिषिद्धानि चैतानि सेवमानो व्रजेदधः ॥ ६ ॥ आगच्छ गच्छ तिष्ठेति स्वागतं सुहृदोऽपि वा । सम्माननं च न ब्रूयान्मुनिर्मोक्षपरायणः ॥ ७ ॥ प्रतिग्रहं न गृह्णीयान्नैव चान्यं प्रदापयेत् । प्रेरयेद्वा तया भिक्षुः स्वप्नेऽपि न कदाचन ॥ ८ ॥ जायाभ्रातृसुतादीनां बन्धूनां च शुभाशुभम् । श्रुत्वा दृष्ट्वा न कम्पेत शोकहर्षौ त्यजेद्यतिः ॥ ९ ॥ अहिंसा सत्यमस्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहाः । अनौद्धत्यमदीनत्वं प्रसादः स्थैर्यमार्जवम् ॥ १० ॥ अस्नेहो गुरुशुश्रूषा श्रद्धा क्षान्तिर्दमः शमः । उपेक्षा धैर्यमाधुर्यं तितिक्षा करुणा तथा ॥ ११ ॥ ह्रीस्तथा ज्ञानविज्ञाने योगो लघ्वशनं धृतिः । एष स्वधर्मा विख्यातो यतीनां नियतात्मनाम् ॥ १२ ॥ जो ज्ञानी मनुष्य लोक, वेद, विषय-वासनाओं के भोग एवं समस्त इन्द्रियों की अधीनता का परित्याग करके एक मात्र अपने आत्मा के उत्थान में सतत स्थिर रहता है, वही परिव्राजक (संन्यासी) श्रेष्ठ गति को प्राप्त करता है। उत्तम परिव्राजक नाम, गोत्र आदि के वरण, देश, काल, शास्त्रीय ज्ञान, कुल, अवस्था, आचार, व्रत- उपवास एवं शील आदि का प्रकाशन (प्रचार-प्रसार) कदापि न करे। (वह) किसी भी स्त्री से वार्त्तालाप कभी न करे। पूर्व में देखी हुई किसी भी परिचित स्त्री का अपने मन में स्मरण तक भी न करे, उन स्त्रियों की चर्चा से सदैव दूर रहे और उनके चित्र आदि को भी कभी न देखे। भाषण-सम्भाषण, स्मरण, चर्चा एवं चित्रों को देखना, स्त्रियों से सम्बन्धित इन चार तरह की बातों का जो (मनुष्य) मोह के वश हुआ आचरण करता है, निश्चय ही उसके चित्त में विकार उत्पन्न हो जाते हैं और उन विकारों से उसका धर्म अवश्य ही नष्ट हो जाता है। संन्यासियों के लिए आसक्ति, क्रोध, झूठ, माया, मोह, लोभ, प्रिय, अप्रिय, शिल्पकला, व्याख्यान करना, कामना, राग, संग्रह, अहंकार, परगृह निवास, चिकित्सा का व्यवसाय, ममता, धर्म के लिए साहसिक कार्य, मन्त्र प्रयोग, औषधि-वितरण, जहर देना, आशीर्वाद देना आदि ये सभी कार्य वर्जित हैं। इनका उपयोग करने वाला परिव्राजक अपने धर्म (लक्ष्य) से पदच्युत हो जाता है। मोक्ष धर्म में सतत संलग्न रहने वाला ज्ञानी संन्यासी अपने किसी हितैषी (शुभचिन्तक) के लिए भी आओ, जाओ, रुको आदि स्वागत एवं सम्मान की बात कभी न करे। स्वप्न में भी कभी किसी के द्वारा दिया हुआ दान स्वीकार न करे। दूसरे अन्य किसी को भी न दिलवाए और न खुद ही किसी को देने-लेने के लिए बाध्य करे। स्त्री-पुरुष आदि भी आत्मीय स्वजनों के शुभ अथवा अशुभ समाचारों को सुनकर-देखकर कभी भी अपने लक्ष्य से विचलित न हो, दुःख-सुख को सदैव के लिए त्याग दे। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, इन्द्रिय-निग्रह, अपरिग्रह (आदि का पालन करना), उद्दण्डता के भाव से रहित होना, किसी व्यक्ति विशेष के समक्ष दीन-हीन न होना, प्रसन्नता, स्थिरता, सरलता,