१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपदेश ४ मन्त्र ३६ १४२ अंधे, मूर्ख, बधिर, पागल तथा गूँगे की तरह से इच्छा रखता हुआ भूमि पर विचरता रहे। बहूदक एवं वन में स्थिर संन्यासियों के लिए त्रिकाल स्नान कहा गया है, लेकिन 'हंस' नामक संन्यासी के लिए दिन में मात्र एक ही बार स्नान करने का नियम है। 'हंस' नामक संन्यासी से श्रेष्ठ-उच्च स्थिति वाले 'परमहंस' नामक संन्यासी के लिए स्नान आदि का कोई विशेष नियम नहीं है ॥ १३-२३ ॥ मौनं योगासनं योगस्तितिक्षैकान्तशीलता। निःस्पृहत्वं समत्वं च सप्तैतान्येकदण्डिनाम् ॥ २३ ॥ परहंसाश्रमस्थो हि स्नानादेरविधानतः। अशेषचित्तवृत्तीनां त्यागं केवलमाचरेत् ॥ २४ ॥ त्वङ्मांसरुधिरस्नायुमज्जामेदोस्थिसंहतौ । विण्मूत्रपूये रमंतां क्रिमीणां कियदन्तरम् ॥ २५ ॥ क्व शरीरमशेषाणां श्लेष्मादीनां महाचयः। क्व चाङ्गशोभा सौभाग्यकमनीयादयो गुणाः ॥ २६ ॥ मांसासृक्पूयविण्मूत्रस्नायुमज्जास्थिसंहतौ। देहे चेत्प्रीतिमान्मूढो भविता नरकेऽपि सः ॥ २७ ॥ स्त्रीणामवाच्यदेशस्य क्लिन्ननाडीव्रणस्य च । अभेदेऽपि मनोभेदाज्जनः प्रायेण वञ्च्यते ॥ २८ ॥ चर्मखण्डं द्विधा भिन्नमपानोद्गारधूपितम्। ये रमन्ति नमस्तेभ्यः साहसं किमतः परम् ॥ २९ ॥ न तस्य विद्यते कार्यं न लिङ्गं वा विपश्चितः। निर्ममो निर्भयः शान्तो निर्द्वन्द्वोऽवर्णभोजनः ॥ ३० ॥ मुनिः कौपीनवासाः स्यान्नग्नो वा ध्यानतत्परः। एवं ज्ञानपरो योगी ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ३१ ॥ लिङ्गे सत्यपि खल्वस्मिञ्ज्ञानमेव हि कारणम्। निर्मोक्षायेह भूतानां लिङ्गग्रामो निरर्थकः ॥३२ ॥ यन्न सन्तं न चासन्तं नाश्रुतं न बहुश्रुतम्। न सुवृत्तं न दुर्वृत्तं वेद कश्चित्स ब्राह्मणः ॥ ३३ ॥ तस्मादलिङ्गो धर्मज्ञो ब्रह्मवृत्तमनुव्रतम्। गूढधर्माश्रितो विद्वानज्ञातचरितं चरेत् ॥ ३४ ॥ संदिग्धः सर्वभूतानां वर्णाश्रमविवर्जितः। अन्धवज्जडवच्चापि मूकवच्च महीं चरेत् ॥ ३५ ॥ तं दृष्ट्वा शान्तमनसं स्पृहयन्ति दिवौकसः। लिङ्गाभावात्तु कैवल्यमिति ब्रह्मानुशासनमिति ॥३६ ॥ एकदण्डी संन्यासियों के पालन करने योग्य ये सात प्रकार के नियम- 'वाणी का मौन, योगासन, योग, तप-तितिक्षा, एकान्तवास, निःस्पृहभाव एवं समभाव' बतलाये गये हैं। जो परिव्राजक परमहंस की उच्च श्रेणी में पहुँच चुका है, उसके लिए स्नान आदि आवश्यक न होने के कारण केवल वह समस्त चित्त-वृत्तियों का त्याग मात्र करे। त्वचा, मांस, रक्त, नाड़ी, मेद, मज्जा एवं अस्थि सहित इस देह में रमण करने वाले पुरुषों और मल-मूत्र एवं पीप में रहने वाले कृमि-कीटकों में कितना अन्तर है ? कहाँ समस्त कफ आदि घृणित पदार्थों का एकत्रित विशाल रूप यह शरीर और कहाँ अंग-अवयवों की शोभा, विशेष सौन्दर्य एवं कमनीयता आदि गुण। अज्ञानी मनुष्य रक्त, मांस, पीप, मल-मूत्र, मज्जा, नाड़ी एवं अस्थियों के सहित इस देह में यदि प्रीति करता है, तो उसे नरक की निश्चय ही प्राप्ति होगी। उच्चारण न करने योग्य स्त्रियों के गुह्याङ्ग तथा सड़े हुए नाड़ी के घाव में विशेष कोई अन्तर न होने पर भी व्यक्ति अपने अन्तःकरण की मान्यता के भेद से प्रायः वंचित किया जाता है। आखिर स्त्रियों का वह गुह्याङ्ग क्या है ?- दो भागों में विदीर्ण हुआ चर्मखण्ड मात्र और वह भी अपान वायु के निष्क्रमण से दुर्गन्धयुक्त रहता है। जो मनुष्य सतत उसमें रमण करते रहते हैं, उन्हें नमस्कार है। इससे अधिक बड़ा दुस्साहस और क्या हो सकता है ? ज्ञानी परिव्राजक के लिए न कोई कर्त्तव्य शेष रहता है और न ही चिह्न विशेष को धारण करने की कोई विशेष आवश्यकता। वह संन्यासी ममता-विहीन, भय रहित, शान्त, द्वन्द्वरहित, जाति-वर्ग आदि के अहं से रहित तथा भोजन आदि के उपार्जन की चेष्टा से रहित होता है। संन्यासी मुनि लँगोटी धारण करके ही रहे या फिर वस्त्र रहित होकर नग्नावस्था में रहता हुआ परमात्मा के चिन्तन में सदा लगा रहे। इस तरह से ज्ञानपरायण यति ब्रह्म के भाव की प्राप्ति में सक्षम होता है। परिव्राजक का