भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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उपदेश ५ मन्त्र २० १५० तो एक चादर अपने शरीर में सदैव ओढ़कर रहता है अथवा सम्पूर्ण अंगों में भस्म धारण किये रहता है, परमहंस सर्वत्यागी होता है ॥ ११-१५ ॥ तुरीयातीतो गोमुखः फलाहारी। अन्नाहारी चेद्गृहत्रये देहमात्रावशिष्टो दिगम्बरः कुणपवच्छरीरवृत्तिकः॥ १६॥ अवधूतस्त्वनियमोऽभिशस्तपतितवर्जनपूर्वकं सर्ववर्णेष्व- जगरवृत्त्याहारपरः स्वरूपानुसंधानपरः ॥ १७ ॥ तुरीयातीत संन्यासी गौ के सदृश ईश्वरेच्छा से जो कुछ भी प्राप्त हो जाए, उसी में निर्वाह कर लेता है। यह संन्यासी कभी किसी से कुछ नहीं माँगता। यह प्रायः फलाहारी ही होता है और यदि अन्नाहार करता है, तो केवल तीन घरों से ही अन्न लेता है। शरीर के अतिरिक्त उसके पास और कुछ भी नहीं होता। वह दिगम्बर (नग्न) रहते हुए अपनी इन्द्रियों को मृतकों की भाँति चेष्टारहित बना लेता है। अवधूत नामक संन्यासी किसी भी तरह के बन्धन को नहीं मानता। कलंक युक्त और पथ-भ्रष्ट मनुष्यों को त्यागकर बिना-किसी वर्ण-भेद के अजगर वृत्ति से अन्न प्राप्त करते हुए अपने आत्मा के स्वरूप के चिन्तन में सतत संलग्न रहता है ॥ १६-१७ ॥ आतुरो जीवति चेत्क्रमसंन्यासः कर्तव्यः ॥ १८॥ आतुर मनुष्य संन्यास स्वीकार करने के बाद जीवित रहे, तो उसे क्रम-संन्यास ग्रहण कर लेना चाहिए ॥ कुटीचकबहूदकहंसानां ब्रह्मचर्याश्रमादितुरीयाश्रमवत् कुटीचकादीनां संन्यासविधिः ॥ १९ ॥ कुटीचक, बहूदक तथा हंस नामक इन तीन तरह के संन्यासियों को ब्रह्मचर्य, गृहस्थ एवं वानप्रस्थ के क्रमानुसार ही चतुर्थ आश्रम अर्थात् संन्यास आश्रम में प्रविष्ट होने का नियम है ॥ १९ ॥ परमहंसादित्रयाणां न कटिसूत्रं न कौपीनं न वस्त्रं न कमण्डलुर्न दण्डः। सार्ववर्णिकभैक्षा- टनपरत्वं जातरूपधरत्वं विधिः । संन्यासकालेऽप्यलं बुद्धिपर्यन्तमधीत्य तदनन्तरं कटिसूत्रं कौपीनं दण्डं वस्त्रं कमण्डलुं सर्वमप्सु विसृज्याथ जातरूपधरश्चरेन्न कन्थावेशो नाध्येतव्यो न वक्तव्यो न श्रोतव्यमन्यत्किंचित्प्रणवादन्यं न तर्कं पठेन्न शब्दमपि बृहच्छब्दान्नाध्यापयेन्न महद्वाचो विग्लापनं गिरा पाण्यादिना संभाषणं नान्यस्माद्वा विशेषेण न शूद्रस्त्रीपतितोदक्या संभाषणं न यतेर्देवपूजा नोत्सवदर्शनं तीर्थयात्रावृत्तिः ॥ २० ॥ परमहंस, तुरीयातीत एवं अवधूत संन्यासियों के लिए कटिसूत्र, कौपीन दण्ड, कमण्डलु एवं वस्त्रादि धारण करने की कोई विशेष आवश्यकता नहीं है। वे जातरूपधर रहकर समस्त वर्ण-जाति के घरों से भिक्षा याचना के लिए स्वतन्त्र हैं। संन्यास धर्म स्वीकार करने के समय 'मैंने जितना भी कुछ अध्ययन किया है, वह अपने आप में पर्याप्त है' इस तरह का दृढ़-निश्चय जब तक न हो जाए, तब तक अध्ययन करते रहना चाहिए। तत्पश्चात् कौपीन, कटिसूत्र आदि को जल में विसर्जित कर देना चाहिए। यदि वह दिगम्बर (वस्त्र से रहित) हो, तो फिर वह कन्था (कथरी) आदि अपने पास न रखे, पठन-पाठन न करे, प्रवचन, कथा-स्तुति आदि श्रवण न करे तथा उसे व्याख्यान आदि भी नहीं देना चाहिए। तर्कशास्त्र एवं शब्दशास्त्र आदि कुछ भी पढ़ने की कोई विशेष आवश्यकता नहीं है। उसे मात्र प्रणव रूपी ॐकार का ही जप करना चाहिए। वाणी का व्यर्थ में अपव्यय करना वर्जित है। संकेत मात्र से बात करना भी निषिद्ध है। वह शूद्र, पदच्युत एवं स्त्री से बात बिल्कुल न करे। रजस्वला स्त्री से तो भूलकर भी बात न करे। विशेष उत्सव समारोह-पूजा आदि देखना, तीर्थ यात्रा करना या देवताओं का पूजन-अर्चन आदि भी यति के लिए आवश्यक नहीं है ॥ २० ॥