भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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१५५ नारदपरिव्राजकोपनिषद् अधिकारी होता है। जो परिव्राजक समस्त प्राणियों को अभयदान करके विचरण करता है, उसे भी किसी प्राणी से कहीं पर भी भय नहीं होता; जो मान और अहंकार का परित्याग करके द्वन्द्व जनित विकार से रहित हो जाता है; उसके मन के सभी संशय मिट जाते हैं; वह न तो किसी प्राणी पर क्रोध करता है, न किसी से ईर्ष्या-द्वेष आदि रखता है तथा न वाणी से कभी मिथ्यावादन ही करता है। जो पुण्य स्थलों में सतत विचरण करता रहता है, किसी भी भूत (प्राणी) की हिंसा नहीं करता तथा समय मिलने पर भिक्षा-मात्र से ही अपना जीवन-निर्वाह पूर्ण करता है; ऐसा यति ब्रह्म के भाव को प्राप्त करने में समर्थ होता है। उसे वानप्रस्थ तथा गृहस्थों से कभी भी संसर्ग नहीं रखना चाहिए। वह इस बात का ध्यान रखे कि उसकी जीवनचर्या अन्य दूसरों पर परिलक्षित न हो। संन्यासी में कभी भी प्रसन्नता का आवेश नहीं होना चाहिए। जिस प्रकार कृमि-कीटक सतत विचरण करते रहते हैं, उसी प्रकार संन्यासी भी सूर्य के द्वारा दिखलाए हुए मार्ग से पृथिवी पर विचरण करे अर्थात् रात्रि में विचरण न करे॥ ४१-४६॥ आशीर्युक्तानि कर्माणि हिंसायक्तानि यानि च। लोकसंग्रहयुक्तानि नैव कुर्यान्न कारयेत् ॥४७॥ नासच्छास्त्रेषु सज्जेत नोपजीवेत जीविकाम्। अतिवादांस्त्यजेत्तर्कान्नपक्षं कंचन नाश्रयेत् ॥ ४८ ॥ न शिष्याननुबध्नीत ग्रन्थान्नैवाभ्यसेद्बहून्। न व्याख्यामुपयुञ्जीत नारम्भानारभेत्क्वचित् ॥ ४९ ॥ अव्यक्तलिङ्गोऽव्यक्तार्थो मुनिरुन्मत्तबालवत्। कविर्मूकवदात्मानं तद्दृष्ट्या दर्शयेन्नृणाम् ॥५०॥ न कुर्यान्न वदेत्किंचिन्न ध्यायेत्साध्वसाधु वा। आत्मारामोऽनया वृत्त्या विचरेज्जडवन्मुनिः ॥५१॥ एकश्चरेन्महीमेतां निःसङ्गः संयतेन्द्रियः। आत्मक्रीड आत्मरतिरात्मवान्समदर्शनः ॥५२॥ बुधो बालकवत्क्रीडेत्कुशलो जडवच्चरेत्। वदेदुन्मत्तवद्विद्वान् गोचर्यां नैगमश्चरेत् ॥ ५३ ॥ क्षिप्तोऽवमानितोऽसद्भिः प्रलब्धोऽसूयितोऽपि वा। ताडितः संनिरुद्धो वा वृत्त्या वा परितापितः ॥ विष्ठितो मूत्रितो वाऽज्ञैर्बहुधैवं प्रकल्पितः। श्रेयस्कामः कृच्छ्रगत आत्मनात्मानमुद्धरेत् ॥ ५५ ॥ संमाननं परां हानिं योगर्द्धेः कुरुते यतः। जनेनावमतो योगी योगसिद्धिं च विन्दति ॥ ५६ ॥ तथा चरेत वै योगी सतां धर्ममदूषयन्। जना यथावमन्येरन्नाच्छेयुर्नैव सङ्गतिम् ॥ ५७ ॥ जरायुजाण्डजादीनां वाङ्मनःकायकर्मभिः। युक्तः कुर्वीत न द्रोहं सर्वसङ्गांश्च वर्जयेत् ॥ ५८ ॥ कामक्रोधौ तथा दर्पलोभमोहादयश्च ये। तांस्तु दोषान्परित्यज्य परिव्राड् भयवर्जितः ॥ ५९॥ 'कामनाओं, हिंसा एवं लोक संग्रह से संयुक्त जो-जो भी कर्म हैं, उन समस्त कर्मों को परिव्राजक न तो खुद करें और न ही दूसरे अन्य लोगों से ही कराये। असत् शास्त्रों के प्रति कभी भी आसक्त न हो। वह किसी भी तरह का जीविका-उपार्जन का साधनभूत कर्म सम्पन्न करके जीवनयापन कदापि न करे। अनावश्यक बात कभी न करे तथा तर्क-वितर्क आदि भी करना त्याग दे। वादी एवं प्रतिवादी में से किसी का भी पक्ष ग्रहण न करे। शिष्यों का भी संग्रह नहीं करना चाहिए। विभिन्न तरह के अधिकाधिक ग्रंथों का अध्ययन न करे तथा अपने पक्ष की सफलता के लिए अपने मन की व्याख्या का प्रयोग न करे। भिन्न-भिन्न आयोजनों-उत्सवों आदि के द्वारा अपनी ख्याति न फैलाए। अपने आश्रमादि का कोई चिह्न विशेष न लगाए। दूसरे लोगों के समक्ष पागल अथवा बालकों के सदृश अज्ञानी बना रहे। ज्ञानवान् होकर के भी गूँगे की भाँति मौन धारण किये रहे। दूसरे अन्य लोग जिस प्रकार का भाव रखें, उनके सामने वैसा ही अपना स्वरूप बनाकर रहे। अच्छे-बुरे विचारों को अपने मन में न आने दे। मूक होकर विचरण करे तथा किसी भी तरह का कोई कर्म न करे। अपनी आत्मा में ही सदैव रमण करता रहे। सर्वत्र जड़वत् शान्त होकर रहे। अपनी इन्द्रियों को संयमित रखे। वासना का

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