१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१७३ नारदपरिव्राजकोपनिषद्
महिमा का भी अवलोकन कर लेता है, वह सभी प्रकार के दुःखों से मुक्त हो जाता है। वह परमेश्वर हाथ-पैर आदि से रहित होते हुए भी सभी प्रकार की वस्तुओं को प्राप्त कर लेने वाला है और शीघ्रतापूर्वक यत्र-तत्र- सर्वत्र गमन करने वाला है। नेत्र विहीन होते हुए भी सभी कुछ देखने में समर्थ है। कानों (कर्णों) से रहित होते हुए भी सभी कुछ श्रवण करने में सक्षम है। वह जानकारी प्राप्त होने वाली सभी प्रकार की वस्तुओं को जानता है, किन्तु उस महान् ईश्वर को जानने वाला कोई भी नहीं है। विद्वान् मनुष्य उसे प्राचीन एवं महान् पुरुष (पुरुषोत्तम, पुरुष श्रेष्ठ) आदि कहते हैं। जो इन नाशवान् शरीरों में नित्य एवं देहरहित होकर भी प्रतिष्ठित है। उस सर्वत्र व्याप्त महान् परमेश्वर को जान लेने पर धैर्यवान् पुरुष कभी शोकाकुल नहीं होता। वह समस्त भूत- प्राणियों का धारण-पोषण करने वाला है। उस परमेश्वर की अघटित-घटना-पटीयसी शक्ति अचिन्त्य है, समस्त शास्त्रों के सिद्धान्त रूप से स्वीकृत अर्थ विशेष-परब्रह्म के रूप में वही जानने योग्य है। परात्पर परब्रह्म के रूप में भी वही ज्ञातव्य है एवं सभी के अवसान में अर्थात् समस्त विश्व के प्रलय होने पर सबके संहार के रूप में उसी श्रेष्ठ प्रभु को जानना चाहिए ॥ १४-१८॥ कविं पुराणं पुरुषोत्तमोत्तमं सर्वेश्वरं सर्वदेवैरूपास्यम् । अनादिमध्यान्तमनन्तमव्ययं शिवाच्युताम्भोरुहगर्भभूधरम् ॥ १९ ॥ स्वेनावृतं सर्वमिदं प्रपञ्चं पञ्चात्मकं पञ्चसु वर्तमानम् । पञ्चीकृत्यानन्तभवप्रपञ्चं पञ्चीकृतस्वावयवैरसंवृतम् । परात्परं यन्महतो महान्तं स्वरूपतेजो- मयशाश्वतं शिवम् ॥ २० ॥ नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः । नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥ २१ ॥ नान्तःप्रज्ञं न बहिःप्रज्ञं न स्थूलं नास्थूलं न ज्ञानं नाज्ञानं नोभयतः प्रज्ञमग्राह्यमव्यवहार्यं स्वान्तःस्थितः स्वयमेवेति य एवं वेद स मुक्तो भवति स मुक्तो भवतीत्याह भगवान्पितामहः ॥ २२ ॥ वह कवि, जो त्रिकाल को जानने वाला है, पुराण पुरुष, सर्वोत्तम एवं पुरुष श्रेष्ठ है। वही सबका परमेश्वर तथा देवों के द्वारा उपासनीय है। आदि, मध्य एवं अन्त से परे है, वह कभी विनष्ट नहीं होता। वही शिव, विष्णु एवं कमल से प्रादुर्भूत होने वाले ब्रह्मारूपी वृक्षों को उत्पन्न करने वाला महान् पर्वत है। जो पञ्चभूतों से युक्त है और पाँच इन्द्रियों में स्थित रहता है, जिसने अनन्त जन्मों के विस्तार की परम्परा अभिवर्द्धित कर रखी है, इस समस्त प्रपञ्च को उस परमात्मा ने पञ्चमहाभूतों के रूप में प्रादुर्भूत किये हुए अपने ही अंगों द्वारा स्वयं ही फैला रखा है; फिर भी वह स्वयं पञ्चभूतों से युक्त अंगों से ढका नहीं है। वह पर से परे और महान् से भी महान् है। वह अपने स्वरूपानुसार स्वतः स्वरूप है, सनातन एवं कल्याणमय है। जो दुराचार से निवृत्त नहीं हुआ है, जिसकी इन्द्रियाँ शान्तरहित अर्थात् अपने वश में नहीं हैं, जो स्थिर चित्त नहीं हुआ है तथा जिसका मन पूर्णरूपेण शान्त नहीं हो सका है, वह इन परमात्म स्वरूप को श्रेष्ठ, पवित्र ज्ञान के द्वारा नहीं प्राप्त कर सकता है। वह पूर्ण परमेश्वर न अन्तःप्रज्ञ है, न बाह्य प्रज्ञ है, वह न स्थूल है और न ही सूक्ष्म है। वह न ज्ञानस्वरूप है और न ही वह अज्ञानी है। वह मनुष्य की पकड़ से परे तथा व्यवहार का विषय नहीं है। वह अपने अन्दर स्वयं ही विद्यमान है। जो ज्ञानी पुरुष उस अनादि परमेश्वर को इस प्रकार से जानता है, वह मुक्ति को प्राप्त कर लेता है, वह मुक्त हो जाता है। ऐसा उपदेश पितामह ब्रह्माजी ने देवर्षि नारद को प्रदान किया ॥ १९-२२ ॥ स्वस्वरूपज्ञः परिव्राट् परिव्राडेकाकी चरति भयत्रस्तसारङ्गवत्तिष्ठति । गमनविरोधं न करोति । स्वशरीरव्यतिरिक्तं सर्वं त्यक्त्वा षट्पदवृत्त्या स्थित्वा स्वरूपानुसन्धानं कुर्वन्सर्वमनन्यबुद्ध्या स्वस्मिन्नेव मत्तो भवति । स परिव्राट् सर्वक्रियाकारकनिवर्तको