१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१७९ पञ्चब्रह्मोपनिषद् अघोरं सलिलं चन्द्रं गौरी वेदद्वितीयकम्। नीरदाभं स्वरं सान्द्रं दक्षिणाग्निरुदाहृतम्॥ ७॥ पञ्चाशद्वर्णसंयुक्तं स्थितिरिच्छाक्रियान्वितम्। शक्तिरक्षणसंयुक्तं सर्वाघौघविनाशनम्॥ ८॥ सर्वदुष्टप्रशमनं सर्वैश्वर्यफलप्रदम् ॥ ९॥ जल, चन्द्र, गौरी, यजुर्वेद, नीरदाभ (मेघ की आभा वाले), स्वर (उकार), स्निग्ध, दक्षिणाग्नि आदि ये सभी अघोर के स्वरूप बतलाये गये हैं। ये तथा इनके अतिरिक्त पचास (अ से लेकर क्ष तक जो) वर्ण हैं, उनसे युक्त स्थिति, इच्छा तथा क्रिया शक्ति से युक्त (अपनी विकल्पित) शक्ति के रक्षण से युक्त जो अघोर का स्वरूप है, वह सभी तरह के पापों के समूह का शमन करने वाला, सभी दुष्टों का विनाश करने वाला तथा सभी तरह के ऐश्वर्य के फल को प्रदान करने वाला है॥ ७-९॥ वामदेवं महाबोधदायकं पावकात्मकम्। विद्यालोकसमायुक्तं भानुकोटिसमप्रभम्॥ १०॥ प्रसन्नं सामवेदाख्यं गानाष्टकसमन्वितम्। धीरस्वरमधीनं चाहवनीयमनुत्तमम्॥ ११॥ ज्ञानसंहारसंयुक्तं शक्तिद्वयसमन्वितम्। वर्णं शुक्लं तमोमिश्रं पूर्णबोधकरं स्वयम्॥ १२॥ धामत्रयनियन्तारं धामत्रयसमन्वितम्। सर्वसौभाग्यदं नृणां सर्वकर्मफलप्रदम्॥ १३॥ अष्टाक्षरसमायुक्तमष्टपत्रान्तरस्थितम्॥ १४॥ 'वामदेव' महान् ज्ञान प्रदायक एवं तेजस्वी अग्नि के स्वरूप, विद्या के आलोक से आलोकित, करोड़ों सूर्यों के सदृश तेजोमय तथा सर्वदा आनन्द स्वरूप हैं। अष्टगान (सामवेद के कहे गये सात गान एवं एक भरत शास्त्र निष्पन्न गीति) से समन्वित मन्द स्वर (आ, आ, आम्) के अधीन तथा सर्वोत्तम आहवनीय (अग्निसदृश), ज्ञान एवं संहार शक्ति से समन्वित उनका (वामदेव का) स्वरूप है। वह शुक्ल वर्ण, तमोगुण युक्त तथा स्वयं ही पूर्णज्ञाता, (जाग्रत् आदि) तीनों धामों के नियामक, तीनों धामों (विश्व, तैजस, प्राज्ञ) से युक्त, सभी को सौभाग्य प्रदान करने वाले, मनुष्यों के सभी कर्मों के फल प्रदाता तथा (अ, क, च, ट, त, प, य, श) इन आठ अक्षरों (अथवा आठ क्षरित न होने वाले तत्त्वों अथवा ॐनमो महादेवाय के आठ अक्षरों) तथा अष्टदल (पंखुड़ियों) से युक्त कमल अर्थात् हृदय रूपी कमल में निवास करने वाले हैं॥ १०-१४॥ यत्तत्तत्पुरुषं प्रोक्तं वायुमण्डलसंवृतम्। पञ्चाग्निना समायुक्तं मन्त्रशक्तिनियामकम्॥१५॥ पञ्चाशतस्वरवर्णाख्यमथर्ववेदस्वरूपकम्। कोटिकोटिगणाध्यक्षं ब्रह्माण्डाखण्डविग्रहम्॥१६ वर्णं रक्तं कामदं च सर्वाधिव्याधिभेषजम्। सृष्टिस्थितिलयादीनां कारणं सर्वशक्तिधृक्॥१७॥ अवस्थात्रितयातीतं तुरीयं ब्रह्मसंज्ञितम्। ब्रह्माविष्णुवादिभिः सेव्यं सर्वेषां जनकं परम्॥ १८॥ जो यह 'तत्पुरुष' हमने कहा है, वह वायुमण्डल से आपूरित पाँच अग्नियों से संयुक्त होकर मंत्र शक्ति का नियामक अर्थात् नियमन करने वाला है। वे स्वर एवं व्यञ्जन के रूप में पचास संख्या से प्रसिद्ध, अथर्ववेद के स्वरूप वाले, अनन्त कोटि गणों के अध्यक्ष तथा अखण्ड अर्थात् सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड रूप शरीर वाले हैं। उन (तत्पुरुष) का वर्ण लाल है, वे समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाले तथा सब प्रकार की आधि- व्याधियों (मानसिक एवं शारीरिक रोगों) की अनुपम औषधि हैं। ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, पालन एवं संहार के एक मात्र कारण हैं और समस्त शक्तियों को धारण करने में समर्थ हैं। इसके अतिरिक्त वे (जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति) तीनों अवस्थाओं से परे तुरीयावस्था (चतुर्थ अवस्था) स्वरूप एवं ब्रह्म की संज्ञा से युक्त हैं। वे (ब्रह्म) ही सभी को प्रादुर्भूत करने वाले, ब्रह्मा एवं विष्णु आदि के द्वारा सर्वदा सेवित होने वाले हैं॥ १५-१८॥ ईशानं परमं विद्यात्प्रेरकं बुद्धिसाक्षिणम्। आकाशात्मकमव्यक्तमोंकारस्वरभूषितम्॥ १९॥ सर्वदेवमयं शान्तं शान्त्यतीतं स्वराद्वहिः। अकारादिस्वराध्यक्षमाकाशमयविग्रहम्॥ २०॥