भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 177, कुल 414 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 177

१८५ परब्रह्मोपनिषद् अनुभव करते हैं। जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश से लटका हुआ बंद कमल ऊर्ध्वमुख होकर खिल जाता है, उसी प्रकार सुप्तावस्था में स्थित योग वृत्तियाँ ब्राह्मी चेतना के संयोग से जाग्रत् और ऊर्ध्वमुखी हो उठती हैं।] सत्त्वमथास्य पुरुषान्तःशिखोपवीतत्वम्। ब्राह्मणस्य मुमुक्षोरन्तःशिखोपवीतधारणम्। बहिर्लक्ष्यमाणशिखायज्ञोपवीतधारणं कर्मिणो गृहस्थस्य। अन्तरुपवीतलक्षणं तु बहिस्तन्तु- वदव्यक्तमन्तस्तत्त्वमेलनम्॥ ३॥ ब्रह्म रूप इस पुरुष का सत्त्व आन्तरिक शिखा और यज्ञोपवीत है। मुमुक्षु ब्राह्मण को यह आन्तरिक शिखा और यज्ञोपवीत ही धारण करना चाहिए। बाहर दिखाई देने वाले शिखा और यज्ञोपवीत को धारण करना गृहस्थ का कर्त्तव्य है। आन्तरिक शिखा और यज्ञोपवीत बाह्य सूत्रवत् शिखा और यज्ञोपवीत के समान व्यक्त नहीं है। वे तो अव्यक्त हैं और ब्रह्मत्व से मेल कराने वाले हैं॥ ३॥ न सन्नासन्न सदसद्भिन्न्राभिन्नं न चोभयम्। न सभागं न निर्भागं न चाप्युभयरूपकम्। ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानं हेयं मिथ्यात्वकारणादिति ॥ ४॥ अविद्या का स्वरूप न सत् है, न असत्; न भिन्न है, न अभिन्न और न दोनों का उभय स्वरूप है। वह न सभाग है, न निर्भाग और न इनका उभय रूप ही है। अतः जब तक अनिर्वचनीय ब्रह्म का आत्मैकत्व (प्रत्येक आत्मा ब्रह्म है, यह ज्ञान) उदित नहीं होता, तभी तक अविद्या की स्थिति है। ब्रह्म स्वरूप का वास्तविक ज्ञान हो जाने पर, यह सभी हेय है, त्याग देने योग्य है, क्योंकि यह सब मिथ्या है॥ ४॥ पञ्चपादब्रह्मणो न किंचन। चतुष्पादन्तर्वर्तिनोऽन्तर्जीवब्रह्मणश्चत्वारि स्थानानि। नाभिहृदयकण्ठमूर्धसु जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तितुरीयावस्थाः। आहवनीयगार्हपत्यदक्षिणसभ्याग्निषु। जागरिते ब्रह्मा स्वप्ने विष्णुः सुषुप्तौ रुद्रस्तुरीयमक्षरं चिन्मयम्। तस्माच्चतुरवस्था। चतुरङ्गुलवे- ष्टनमिव षण्णवतितत्त्वानि तन्तुवद्विभज्य तदाहितं त्रिगुणीकृत्य द्वात्रिंशत्तत्त्वनिष्कर्षमापाद्य ज्ञानपूतं त्रिगुणस्वरूपं त्रिमूर्तित्वं पृथग्विज्ञाय नवब्रह्माख्यनवगुणोपेतं ज्ञात्वा नवमानमितं त्रिःपुनस्त्रि गुणीकृत्य सूर्येन्द्रग्निकलास्वरूपत्वेनैकीकृत्याद्यन्तरेकत्वमपि मध्ये त्रिरावृत्य ब्रह्म विष्णुमहेश्वरत्वमनुसंधायाद्यान्तमेकीकृत्य चिद्ग्रन्थावद्वैतग्रन्थिं कृत्वा नाभ्यादिब्रह्म बिलप्रमाणं पृथक् पृथक् सप्तविंशतितत्त्वसंबन्धं त्रिगुणोपेतं त्रिमूर्तिलक्षणलक्षित मप्येकत्वमापाद्य वामांसादिदक्षिणाकट्यन्तं विभाव्याद्यान्तग्रहसंमेलनमेवं ज्ञात्वा मूलमेकं सत्यं मृण्मयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्। हंसेति वर्णद्वयेनान्तःशिखोपवीतित्वं निश्चित्य ब्राह्मणत्वं ब्रह्मध्यानाईत्वं यतित्वमलक्षितान्तः शिखोपवीतित्वमेवं बहिर्लक्षितकर्म- शिखाज्ञानोपवीतं गृहस्थस्याभासब्राह्मणत्वस्य केशसमूहशिखाप्रत्यक्षकार्पासतन्तुकृ- तोपवीतत्वम्। चतुः चतुर्गुणीकृत्य चतुर्विंशतितत्त्वापादनतन्तुकृत्वं नवतत्त्वमेकमेव परंब्रह्म तत्प्रतिसरयोग्यत्वाद्वहुमार्गप्रवृत्तिं कल्पयन्ति। सर्वेषां ब्रह्मादीनां देवर्षीणां मनुष्याणां मुक्तिरेका। ब्रह्मैकमेव। ब्राह्मणत्वमेकमेव। वर्णाश्रमाचारविशेषाः पृथक्पृथक् शिखा वर्णाश्रमिणामे - ककैव। अपवर्गस्य यतेः शिखायज्ञोपवीतमूलं प्रणवमेकमेव वदन्ति। हंसः शिखा। प्रणव उपवीतम्। नादः संधानम्। एष धर्मो नेतरो धर्मः। तत्कथमिति। प्रणवहंसो नादस्त्रिवृत्सूत्रं स्वहृदि चैतन्ये तिष्ठति त्रिविधं ब्रह्म। तद्विद्धि प्रापञ्चिकशिखोपवीतं त्यजेत्॥५॥