१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें॥ मण्डलब्राह्मणोपनिषद् ॥ यह उपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद से सम्बद्ध है। इसमें कुल पाँच ब्राह्मण हैं, जिसमें महर्षि याज्ञवल्क्य एवं भगवान् सूर्य नारायण के प्रश्नोत्तर रूप में 'आत्मतत्त्व' का विशद विवेचन हुआ है। प्रथम ब्राह्मण में सर्वप्रथम तत्त्वज्ञान की प्राप्ति के लिए अष्टांग योग की आवश्यकता और पुनः चार यम, नौ नियम, आसन, प्राणायामादि षडंग योग, देह के पंच दोष, तारक दर्शन, लक्ष्यत्रय दर्शन, तारक और अमनस्क रूप योग के दो भेद, आत्मनिष्ठ की ब्रह्मरूपता आदि का विस्तृत वर्णन किया गया है। द्वितीय ब्राह्मण में सर्वाधाररूप ज्योति का आत्मतत्त्व के रूप में वर्णन किया गया है, साथ ही ज्योति रूप आत्मा के ज्ञान का फल, शाम्भवी मुद्रा, पूर्णिमा दृष्टि, मुद्रा की सिद्धि और उसके लक्षण, प्रणवरूप आत्म प्रकाश का अनुभव, षण्मुखी मुद्रा से प्रणव की सिद्धि, प्रणवविद् पर कर्म का अप्रभाव, उन्मनी अवस्था से अमनस्क स्थिति की प्राप्ति, ब्रह्मानुसन्धान से कैवल्य की प्राप्ति, ब्रह्मविद् का स्वरूप, सुषुप्ति और समाधि में भेद, ब्रह्म का ब्रह्म रूप होना, जाग्रत् आदि पंच-अवस्था, संसार से पार होने का मार्ग, मन ही बन्ध-मोक्ष का कारण, निर्विकल्पक समाधि के अभ्यास से श्रेष्ठ ब्रह्मविद् होना और ब्रह्मानन्द की प्राप्ति आदि का विशद विवेचन है। तृतीय ब्राह्मण में परमात्मज्ञान एवं लक्ष्य दर्शन से अमनस्कता की प्राप्ति और उससे संसार बन्धन से निवृत्ति, तारक मार्ग से मनोनाश की प्राप्ति, उन्मनी सिद्ध योगी का ब्रह्मरूप होना आदि वर्णित है। चतुर्थ ब्राह्मण में व्योम पंचक का ज्ञान और उसका प्रतिफल तथा राजयोग का सारांश विवेचित है। पंचम ब्राह्मण में, परमात्मा में मन को लीन करने का अभ्यास, अमनस्क अवस्था के अभ्यास से ब्रह्म स्थिति की प्राप्ति, अमनस्कसिद्ध पुरुष की महिमा आदि का वर्णन है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ पूर्णमदः ............ इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-अध्यात्मोपनिषद् ) ॥ प्रथमं ब्राह्मणम् ॥ ॥ प्रथमः खण्डः ॥ याज्ञवल्क्यो ह वै महामुनिरादित्यलोकं जगाम । तमादित्यं नत्वा भो भगवन्नादित्यात्मतत्त्वमनुब्रूहीति ॥ १ ॥ महामुनि याज्ञवल्क्य (एकबार) आदित्यलोक में गये और वहाँ भगवान् आदित्य को प्रणाम करके कहा-हे भगवन् आदित्य ! आप हमें आत्म तत्त्व का उपदेश प्रदान करें ॥ १ ॥ स होवाच नारायणः । ज्ञानयुक्तयमाद्यष्टाङ्गयोग उच्यते ॥ २ ॥ तब सूर्यनारायण ने कहा- तत्त्वज्ञान सहित यम-नियम आदि को अष्टाङ्ग योग कहा जाता है ॥ २ ॥ शीतोष्णाहारनिद्राविजयः सर्वदा शान्तिर्निश्चलत्वं विषयेन्द्रियनिग्रहश्चैते यमाः ॥ ३ ॥ सर्दी-गर्मी, आहार एवं निद्रा पर विजय प्राप्त करना, सर्वदा शान्त रहना और निश्चल होकर इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखना, ये सभी यम हैं ॥ ३ ॥ गुरुभक्तिः सत्यमार्गानुरक्तिः सुखागतवस्त्वनुभवश्च तद्वस्त्वनुभवेन । तुष्टिर्निःसङ्गता एकान्तवासो मनोनिवृत्तिः फलानभिलाषो वैराग्यभावश्च नियमाः ॥ ४ ॥