१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३ मन्त्र ९ २५१
॥ तृतीयोऽध्यायः ॥ अहमस्मि परश्चास्मि ब्रह्मास्मि प्रभवोऽस्म्यहम्। सर्वलोकगुरुश्चास्मि सर्वलोकेऽस्मि सोऽस्म्यहम् ॥ १ ॥ (अन्तः स्थित ब्रह्म) मैं हूँ और (बाह्य स्थित) पर (ब्रह्म) भी मैं ही हूँ, मैं ब्रह्म हूँ, उत्पत्ति हूँ, समस्त लोकों का गुरु हूँ और सभी लोकों में जो भी कुछ है, वह मैं ही हूँ ॥ १ ॥ अहमेवास्मि सिद्धोऽस्मि शुद्धोऽस्मि परमोऽस्म्यहम्। अहमस्मि सदासोऽस्मि नित्योऽस्मि विमलोऽस्म्यहम् ॥ २ ॥ मैं ही सिद्ध हूँ, मैं ही शुद्ध हूँ तथा परम तत्त्व भी मैं ही हूँ। मैं सदैव (विद्यमान रहता) हूँ, मैं नित्य हूँ एवं मलरहित भी मैं ही हूँ ॥ २ ॥ विज्ञानोऽस्मि विशेषोऽस्मि सोमोऽस्मि सकलोऽस्म्यहम्। शुभोऽस्मि शोकहीनोऽस्मि चैतन्योऽस्मि समोऽस्म्यहम् ॥ ३ ॥ मैं विशिष्ट ज्ञान सम्पन्न हूँ, मैं विशेष हूँ, सोम मैं हूँ, सभी कुछ मैं ही हूँ। मैं शुभ हूँ, शोकरहित हूँ, सम हूँ तथा चैतन्य भी मैं ही हूँ ॥ ३ ॥ मानावमानहीनोऽस्मि निर्गुणोऽस्मि शिवोऽस्म्यहम्। द्वैताद्वैतविहीनोऽस्मि द्वन्द्वहीनोऽस्मि सोऽस्म्यहम् ॥ ४ ॥ मैं मान एवं अपमान से रहित हूँ, निर्गुण (गुणरहित) हूँ, मैं ही शिव हूँ, द्वैत एवं अद्वैत के भाव से रहित हूँ, सुख तथा दुःख आदि द्वन्द्वों से रहित हूँ तथा वह (ब्रह्म) मैं ही हूँ ॥ ४ ॥ भावाभावविहीनोऽस्मि भासाहीनोऽस्मि भास्म्यहम्। शून्याशून्यप्रभावोऽस्मि शोभनाशोभनोऽस्म्यहम् ॥ ५ ॥ भाव-अभाव अर्थात् उत्पत्ति और विनाश से परे हूँ। भासा (प्रकाश) से अलग हूँ, किन्तु प्रकाश भी मैं ही हूँ। मैं शून्य और अशून्य रूप हूँ तथा मैं ही सुन्दर और असुन्दर भी हूँ ॥ ५ ॥ तुल्यातुल्यविहीनोऽस्मि नित्यः शुद्धः सदाशिवः। सर्वासर्वविहीनोऽस्मि सात्त्विकोऽस्मि सदास्म्यहम् ॥ ६ ॥ तुल्य-अतुल्य अर्थात् समता एवं विषमता से रहित हूँ, नित्य हूँ, शुद्ध हूँ एवं सदाशिव हूँ। मैं सर्व- असर्व की कल्पना से रहित हूँ, सात्त्विक हूँ और मैं सदैव (विद्यमान रहने वाला) हूँ ॥ ६ ॥ एकसंख्याविहीनोऽस्मि द्विसंख्यावानहं न च। सदसद्भेदहीनोऽस्मि संकल्परहितोऽस्म्यहम् ॥ ७ मैं एक संख्या विहीन (अद्वैतरहित) और दो संख्या रहित (द्वैतरहित) हूँ, सत् और असत् के भेद से रहित हूँ तथा मैं संकल्प से रहित हूँ ॥ ७ ॥ नानात्मभेदहीनोऽस्मि ह्यखण्डानन्दविग्रहः। नाहमस्मि न चान्योऽस्मि देहादिरहितोऽस्म्यहम् ॥ ८ मैं विविधता से रहित तथा अखण्ड आनन्द स्वरूप हूँ। न मैं (अहं रूप) हूँ और अन्य भी नहीं हूँ। मैं शरीरादि से रहित हूँ ॥ ८ ॥ आश्रयाश्रयहीनोऽस्मि आधाररहितोऽस्म्यहम्। बन्धमोक्षादिहीनोऽस्मि शुद्धब्रह्मास्मि सोऽस्म्यहम् ॥ ९ ॥