१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें॥ याज्ञवल्क्यापनिषद् ॥ यह उपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद से सम्बद्ध है। इसमें राजा जनक और याज्ञवल्क्य का संवाद वर्णित है, जिसमें संन्यास धर्म की विस्तृत विवेचना हुई है। संन्यास धर्म की जिज्ञासा रखने वाले राजा जनक से याज्ञवल्क्य जी ने कहा कि ब्रह्मचारी के बाद गृहस्थ, गृहस्थ के बाद वानप्रस्थ तथा वानप्रस्थ के बाद संन्यास का क्रम है; किन्तु भावप्रवणता की स्थिति में-वैराग्य भाव की प्रचुरता की स्थिति में कभी भी संन्यास लिया जा सकता है। संन्यास ग्रहण करने वाले को शिखा, यज्ञोपवीत आदि के त्याग का विधान है। यज्ञोपवीत के बिना ब्राह्मण कैसे कहा जाएगा ? इसका उत्तर देते हुए याज्ञवल्क्य जी ने कहा कि ॐकार ही संन्यासी का यज्ञोपवीत होता है। आगे क्रमशः संन्यासी के गुणों, आचार-विचार आदि की विस्तृत चर्चा है। साथ ही संन्यासी को उसके पथ से विचलित करने वाली स्त्री के दोषों का बीभत्स चित्रण भी किया गया है। सन्तान भी दुःखदायी ही है-यह कहते हुए संन्यासी को लोभ, मोह, काम-क्रोध से बचने का निर्देश है। अन्त में संन्यासी को जितेन्द्रिय बने रहने की सलाह देते हुए उसे अपने एक मात्र लक्ष्य 'परब्रह्म' के चिन्तन-मनन करने का निर्देश है, क्योंकि इसी से उसे मोक्ष की प्राप्ति होना सम्भव है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ पूर्णमदः ........... इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-अध्यात्मोपनिषद्) अथ जनको ह वैदेहो याज्ञवल्क्यमुपसमेत्योवाच भगवन्संन्यासमनुब्रूहीति। स होवाच याज्ञवल्क्यो ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेत्। गृही भूत्वा वनी भवेत् वनी भूत्वा प्रव्रजेत्। यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद्गृहाद्वा वनाद्वा। अथ पुनर्व्रती वाऽव्रती वा स्नातको वाऽस्नातको वा उत्सन्नाग्निरनग्निको वा यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रव्रजेत् ॥ १ ॥ एक समय विदेहराज जनक महर्षि याज्ञवल्क्य जी के समक्ष जाकर बोले- "हे भगवन्! आप कृपा करके हमें संन्यास-धर्म समझाने का कष्ट करें।" तब याज्ञवल्क्य जी ने कहा-हे राजन्! ब्रह्मचर्याश्रम की विधि-विधान से पूर्ण करके, गृहस्थ आश्रम को ग्रहण करना चाहिए। गृहस्थ धर्म में पुत्र-कलत्रादि का सुख भोगकर वन में निवास करे। वानप्रस्थ आश्रम के बाद संन्यास आश्रम को धारण कर लेना चाहिए। यदि जितेन्द्रिय हो जाये, तो ब्रह्मचर्याश्रम से ही संन्यास ले ले या फिर अपनी इच्छानुसार गृहस्थ आश्रम के पश्चात् ले लेना चाहिए। वस्तुतः वानप्रस्थ के पश्चात् या फिर जिस दिन संसार से सर्वथा वैराग्य हो जाए, उसी दिन संन्यास ले लेना चाहिए। चाहे व्रती हो या नहीं, स्नातक हो अथवा न हो, अग्नि की सेवा कर चुका हो अथवा नहीं, जिस क्षण वैराग्य उत्पन्न हो जाए, उसी क्षण संन्यास ले लेना चाहिए॥ १॥ तदेके प्राजापत्यामेवेष्टिं कुर्वन्ति। अथवा न कुर्यादाग्नेय्यामेव कुर्यात्। अग्निर्हि प्राणः। प्राणमेवैतया करोति। त्रैधातवीयामेव कुर्यात्। एतयैव त्रयो धातवो यदुत सत्त्वं रजस्तम इति। अयं ते योनिर्ऋत्विजो यतो जातो अरोचथाः। तं जानन्नग्र आरोहाथा नो वर्धया रयिमित्यनेन मन्त्रेणाग्निमाजिघ्रेत्। एष वा अग्नेर्योनिर्यः प्राणं गच्छ स्वां योनिं गच्छ स्वाहेत्येवमेवैतदाह ॥ इसके पश्चात् कुछ लोग प्राजापत्य यज्ञ करते हैं। या फिर इस यज्ञ को न कर आग्नेय यज्ञ ही कर ले, क्योंकि अग्नि ही प्राण है। इस यज्ञ द्वारा प्राण का ही पोषण होता है या सत, रज, तम त्रिधातुओं से सम्बन्धित यजन करे। तब इस मंत्र से अग्नि का आघ्राण करे-'हे अग्निदेव! जिस मूल कारण से आप प्रादुर्भूत होकर प्रकाशित हो रहे हैं, उसको जानते हुए आप खूब प्रज्वलित हों एवं हमारे ऐश्वर्य को बढ़ाएँ।' यही अग्नि का