१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२५७ याज्ञवल्क्यापनिषद् मांसपाञ्चालिकायास्तु यन्त्रलोकेऽङ्गपञ्जरे । स्नाव्वस्थिग्रन्थिशालिन्याः स्त्रियाः किमिव शोभनम् ॥ १४ ॥ मांस-मेदा आदि द्वारा निर्मित, यत्र-तत्र गमन करने वाली पिटारी रूप नारी के शरीर में, जिसमें कि नसें, हड्डी एवं ग्रन्थियाँ ही स्थित हैं, कौन-सी वस्तु शोभनीय है ॥ १४ ॥ त्वङ्मांसरक्तवाष्पाम्बु पृथक्कृत्वा विलोचने । समालोकय रम्यं चेत्किं मुधा परिमुह्यसि ॥१५ ॥ इस (देवी स्वरूपा नारी) की त्वचा, मांस, रक्त, अश्रु एवं नेत्र आदि पृथक्-पृथक् करके (उसके शरीर के आन्तरिक अवयवों को ) तो देखो। क्या वे शोभनीय लगते हैं? यदि नहीं, तो फिर क्यों इस पर व्यर्थ में इतने मुग्ध (आसक्त) हुए जाते हो ॥ १५ ॥ मेरुशृङ्गतटोल्लासिगङ्गाजलरयोपमा। दृष्टा यस्मिन्मुने मुक्ताहारस्योल्लासशालिता ॥ १६ ॥ जिसके स्तनों पर लटकने वाले हार को मेरुपर्वत के शिखरों के बीच से गिरने वाली गंगाजल की धारा की उपमा दी गई है और वैसे ही वह हार परिलक्षित भी होता है ॥ १६ ॥ श्मशानेषु दिगन्तेषु स एव ललनास्तनः । श्वभिरास्वाद्यते काले लघुपिण्ड इवान्धसः ॥ १७ ॥ श्मशान में तथा यत्र-तत्र दिशाओं में कटकर गिरा हुआ वही नारी का स्तन समय आने पर कुत्तों द्वारा इस तरह से खाया जाता हुआ दिखाई पड़ता है, जैसे कि एक सामान्य-सा खाद्य पदार्थ का टुकड़ा ॥ १७ ॥ केशकज्जलधारिण्यो दुःस्पर्शा लोचनप्रियाः । दुष्कृताग्निशिखा नार्यो दहन्ति तृणवन्नरम् ॥ सुन्दर केशों को सुव्यवस्थित किये हुए, नेत्रों में कज्जल (काजल) लगाने वाली, दुःस्पर्श (स्पर्श के लिए दुष्प्राप्य), नेत्रों को प्रिय लगने वाली, प्रज्वलित अग्नि शिखा के सदृश जो स्त्रियाँ हैं; वे मनुष्य को तृणवत् क्षणभर में जला देती हैं ॥ १८ ॥ ज्वलिता अतिदूरेऽपि सरसा अपि नीरसाः । स्त्रियो हि नरकाग्नीनामिन्धनं चारु दारुणम् ॥१९ ये स्त्रियाँ दूर से ही दग्ध कर देने वाली, अत्यन्त रसयुक्त लगती हुई भी रसहीन कर देने वाली, नरक की अग्नि की लकड़ियाँ हैं, जो कि चारु दारुण (सुन्दर होने पर भी अत्यन्त दुःख दायी) प्रतीत होती हैं १९ ॥ कामनाम्रा किरातेन विस्तीर्णा मुग्धचेतसः । नार्यो नरविहङ्गानामङ्गबन्धनवागुराः ॥ २० ॥ कामदेव रूपी बहेलिये ने मानव रूपी पक्षियों को आबद्ध करने के लिए हृदय को मुग्ध (मोहित) कर देने वाला स्त्रीरूपी जाल बिछा रखा है ॥ २० ॥ जन्मपल्वलमत्स्यानां चित्तकर्दमचारिणाम् । पुंसां दुर्वासनारज्जुर्नारी बडिशपिण्डिका ॥ २१ जन्म रूपी तलैया में निवास करने वाली, कलुषित हृदय रूपी कीचड़ में चलने वाले मनुष्य रूपी मछलियों के लिए दुर्वासना रूपी रस्सी से बँधी ये स्त्रियाँ मछली पकड़ने वाले काँटे की भाँति हैं ॥ २१ ॥ सर्वेषां दोषरत्नानां सुसमुद्रिकयानया । दुःखशृङ्खलया नित्यमलम्स्तु मम स्त्रिया ॥ २२ ॥ सभी तरह के दोष रत्नों की पिटारी रूप इन दुःखों की जंजीर रूपी स्त्री से तो भगवान ही बचाये ॥ २२ ॥ यस्य स्त्री तस्य भोगेच्छा निःस्त्रीकस्य क्व भोगभूः । स्त्रियं त्यक्त्वा जगत्त्यक्तं जगत्त्यक्त्वा सुखी भवेत् ॥ २३ ॥ जिसके पास स्त्री है, उसी के पास भोग की इच्छा है तथा जिसके पास स्त्री ही नहीं, वह कहाँ किसके साथ भोगे ? यदि कोई मनुष्य स्त्री का त्याग कर दे, तो यह समझना चाहिए कि उसने संसार को ही छोड़ दिया। संसार छोड़ देने पर तो प्रत्येक व्यक्ति सुखी हो ही जाता है ॥ २३ ॥ अलभ्यमानस्तनयः पितरौ क्लेशयेच्चिरम् । लब्धो हि गर्भपातेन प्रसवेन च बाधते ॥ २४ ॥ वैसे पुत्र भी कष्ट देने वाला ही होता है; क्योंकि पुत्र न होने पर माता-पिता को बहुत क्लेश होता है। यदि