१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें॥ योगतत्त्वोपनिषद् ॥ यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद से सम्बद्ध है। इसमें योग विषयक विविध उपादानों का विस्तृत वर्णन किया गया है। भगवान् विष्णु के द्वारा पितामह ब्रह्मा के लिए योग विषयक गूढ़ तत्त्वों के निरूपण के साथ उपनिषद् का शुभारम्भ हुआ है। कैवल्य रूपी परमपद की प्राप्ति के लिए योग मार्ग ही श्रेष्ठ साधन बताया गया है। मन्त्रयोग, लययोग, हठयोग एवं राजयोग के क्रम में इनकी चार अवस्थाओं (आरम्भ, घट, परिचय एवं निष्पत्ति) का वर्णन हुआ है। आगे चलकर योगी के आहार-विहार एवं दिनचर्या का उल्लेख किया गया है। उसी क्रम में योगसिद्धि के प्रारम्भिक लक्षणों का वर्णन तथा उससे सावधान रहने का निर्देश भी दिया गया है। पूर्णमनोयोग से की गयी योगसाधना निःसन्देह सफल होती है, जो योगी साधक को सभी सिद्धियों (अणिमा, गरिमा, महिमा आदि) से सम्पन्न कर देती है, वह ईश्वरीय शक्तियों का अधिकारी बन जाता है। अन्ततः वह आत्मतत्त्व का निर्वात दीपशिखा की तरह अन्तःकरण में साक्षात्कार करके आवागमन से मुक्त हो जाता है। इसी फलश्रुति के साथ योगतत्त्व उपनिषद् का समापन हुआ है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ सह नाववतु.......... इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-अवधूतोपनिषद् ) योगतत्त्वं प्रवक्ष्यामि योगिनां हितकाम्यया। यच्छ्रुत्वा च पठित्वा च सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १ योगियों की हित-कामना की दृष्टि से मैं योगतत्त्व का वर्णन करता हूँ, जिसके श्रवण-अध्ययन तथा आचरण में धारण करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं॥ १॥ विष्णुर्नाम महायोगी महाभूतो महातपाः। तत्त्वमार्गे यथा दीपो दृश्यते पुरुषोत्तमः ॥२॥ विष्णु नामक महायोगी ही समस्त (भूत) प्राणियों के आदि महाभूत एवं महातपस्वी हैं। वे पुरुषोत्तम तत्त्वमार्ग में दीपक के सदृश प्रकाशमान हैं॥ २॥ तमाराध्य जगन्नाथं प्रणिपत्य पितामहः। पप्रच्छ योगतत्त्वं मे ब्रूहि चाष्टाङ्गसंयुतम् ॥ ३॥ पितामह ब्रह्माजी ने उन जगत् के स्वामी (भगवान् विष्णु) की आराधना एवं प्रणाम करके, कहा-हे जगन्नाथ ! आप अष्टाङ्ग युक्त योग का उपदेश मुझे प्रदान करें॥ ३॥ तमुवाच हृषीकेशो वक्ष्यामि शृणु तत्त्वतः। सर्वे जीवाः सुखैर्दुःखैर्मायाजालेन वेष्टिताः ॥४॥ यह सुनकर उन भगवान् हृषीकेश ने कहा कि मैं उस तत्त्व का वर्णन करता हूँ, तुम ध्यानयुक्त हो कर श्रवण करो। ये सभी जीव सुख-दुःख के माया रूपी जाल में आबद्ध हैं ॥ ४॥ तेषां मुक्तिकरं मार्गं मायाजालनिकृन्तनम्। जन्ममृत्युजरा व्याधिनाशनं मृत्युतारकम्॥ ५॥ इस सुख-दुःख रूप माया के जाल को काटकर उन (समस्त जीवों) को मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करने वाला तथा जन्म-मृत्यु, जरा-व्याधि से छुटकारा दिलाने वाला यही मृत्युतारक मार्ग है॥५॥ नानामार्गैस्तु दुष्प्रापं कैवल्यं परमं पदम्। पतिताः शास्त्रजालेषु प्रज्ञया तेन मोहिताः ॥ ६॥ कैवल्य रूपी परम पद, अन्य दूसरे मार्गों का आश्रय लेने से कठिनता से प्राप्त होता है। भिन्न-भिन्न शास्त्रों के मतों में पड़कर ज्ञानी जनों की बुद्धि मोह-ग्रस्त हो जाती है॥ ६॥ अनिर्वाच्यं पदं वक्तुं न शक्यं तैः सुरैरपि । स्वात्मप्रकाशरूपं तत्किं शास्त्रेण प्रकाश्यते ॥ ७॥ उस अनिर्वचनीय पद का उल्लेख देवगण भी नहीं कर सकते, तब उस स्वप्रकाशित आत्मा के रूप का वर्णन शास्त्रों में कैसे किया जा सकता है ? ॥ ७॥