भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 255, कुल 414 में से

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मन्त्र ६१ २६३ गोधूममुद्गशाल्यन्नं योगवृद्धिकरं विदुः। ततः परं यथेष्टं तु शक्तः स्याद्वायुधारणे ॥ ४९ ॥ गेहूँ, मूँग एवं चावल का भोजन योग में वृद्धि प्रदान करने वाला बतलाया गया है। इस प्रकार अभ्यास करने से वायु को इच्छानुसार धारण करने की शक्ति प्राप्त हो जाती है ॥ ४९ ॥ यथेष्टधारणाद्वायोः सिध्येत्केवलकुम्भकः। केवले कुम्भके सिद्धे रेचपूरविवर्जिते ॥ ५० ॥ यथेष्ट वायु धारण कर सकने के उपरान्त 'केवल कुम्भक' सिद्ध हो जाता है और तब रेचक और पूरक का परित्याग कर देना चाहिए ॥ ५० ॥ न तस्य दुर्लभं किंचित्त्रिषु लोकेषु विद्यते। प्रस्वेदो जायते पूर्वं मर्दनं तेन कारयेत् ॥ ५१ ॥ (ऐसा कर लेने के बाद) फिर उस (श्रेष्ठ) योगी के लिए तीनों लोकों में कभी कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता। अभ्यास के समय जो पसीना निकले, उसे अपने शरीर में ही मल लेना चाहिए ॥ ५१ ॥ ततोऽपि धारणाद्वायोः क्रमेणैव शनैः शनैः। कम्पो भवति देहस्य आसनस्थस्य देहिनः ॥ ५२ इसके अनन्तर वायु की धारणा शक्ति निरन्तर शनैः-शनैः बढ़ती रहने से आसने पर बैठे हुए साधक के शरीर में कम्पन होने लगता है ॥ ५२ ॥ ततोऽधिकतराभ्यासाद्दार्दुरी स्वेन जायते। यथा च दर्दुरी भाव उत्प्लुत्योत्प्लुत्य गच्छति ॥ ५३ पद्मासनस्थितो योगी तथा गच्छति भूतले। ततोऽधिकतराभ्यासाद्भूतित्यागश्च जायते ॥ ५४॥ इससे आगे और अधिक अभ्यास होने पर मेढ़क की तरह चेष्टा होने लगती है। जिस तरह से मेढक उछलकर, फिर जमीन पर आ जाता है, उसी तरह की स्थिति पद्मासन पर बैठे योगी की हो जाती है। जब अभ्यास इससे भी अधिक बढ़ता है, तो फिर वह योगी जमीन से ऊपर उठने लगता है ॥ ५३-५४॥ पद्मासनस्थ एवासौ भूमिमुत्सृज्य वर्तते। अतिमानुषचेष्टादि तथा सामर्थ्यमुद्भवत् ॥ ५५ ॥ पद्मासन पर बैठा हुआ योगी अत्यन्त अभ्यास के कारण भूमि से ऊपर ही उठा रहता है। वह इस तरह से और भी अतिमानुषी चेष्टाएँ निरन्तर करने लगता है ॥ ५५ ॥ न दर्शयेच्च सामर्थ्यं दर्शनं वीर्यवत्तरम्। स्वल्पं वा बहुधा दुःखं योगी न व्यथते तदा ॥ ५६ ॥ (परन्तु) योगी को इस प्रकार की शक्ति एवं सामर्थ्य का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए, वरन् स्वयं ही देखकर अपना उत्साहवर्द्धन करना चाहिए। तब थोड़ा या बहुत कष्ट भी योगी को पीड़ा नहीं पहुँचा सकता ॥ अल्पमूत्रपुरीषश्च स्वल्पनिद्रश्च जायते। कीलवो दूषिका लाला स्वेददुर्गन्धतानने ॥ ५७॥ एतानि सर्वथा तस्य न जायन्ते ततः परम्। ततोऽधिकतराभ्यासाद्बलमुत्पद्यते बहु ॥ ५८ ॥ योगी का मल-मूत्र अति न्यून हो जाता है तथा निद्रा भी घट जाती है। कीचड़, नाक, थूक, पसीना, मुख की दुर्गन्ध आदि योगी को नहीं होती तथा निरन्तर अभ्यास बढ़ाने से उसे बहुत बड़ी शक्ति मिल जाती है ॥ येन भूचरसिद्धिः स्याद्भूचराणां जये क्षमः। व्याघ्रो वा शरभो वापि गजो गवय एव वा ॥ ५९ सिंहो वा योगिना तेन म्रियन्ते हस्तताडिताः। कन्दर्पस्य यथा रूपं तथा स्यादपि योगिनः ॥ इस प्रकार से योगी को भूचर सिद्धि की प्राप्ति होने से समस्त भू-चरों पर विजय की प्राप्ति हो जाती है। व्याघ्र, शरभ, हाथी, गवय (नीलगाय), सिंह आदि योगी के हाथ मारने मात्र से ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। उस योगी का स्वरूप भी कामदेव के सदृश सुन्दर हो जाता है ॥ ५९-६० ॥ तद्रूपवशगा नार्यः काङ्क्षन्ते तस्य सङ्गमम्। यदि सङ्गं करोत्येष तस्य बिन्दुक्षयो भवेत् ॥ ६१ उस योगी के रूप का अवलोकन कर अनेकानेक स्त्रियाँ आकृष्ट होकर उससे भोग की इच्छा करने लगती हैं, लेकिन यदि योगी उनकी इच्छा की पूर्ति करेगा, तो उसका वीर्य नष्ट हो जायेगा ॥ ६१ ॥

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