१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२७० योगतत्त्वोपनिषद् (जीव ने) जिस योनि में जन्म लिया था, वैसी ही योनि में पुनः-पुनः रमण किया करता है। एक जन्म में जो माँ होती है, वही दूसरे जन्म में पत्नी भी हो जाती है तथा जो पत्नी होती है, वह माता बन जाती है ॥१३२ ॥ यः पिता स पुनः पुत्रो यः पुत्रः स पुनः पिता। एवं संसारचक्रेण कूपचक्रे घटा इव ॥ भ्रमन्तो योनिजन्मानि श्रुत्वा लोकान्समश्रुते । त्रयो लोकास्त्रयो वेदास्त्रिस्रः संध्यास्त्रयः स्वराः ॥ त्रयोऽग्नयश्च त्रिगुणाः स्थिताः सर्वे त्रयाक्षरे । त्रयाणामक्षराणां च योऽधीतेऽप्यर्धमक्षरम् ॥ जो पिता होता है, वह पुत्र बन जाता है तथा जो पुत्र होता है, वह पिता के रूप में जन्म ले लेता है। इस तरह से यह संसार चक्र, कूप-चक्र (पानी खींचने की रहट) के सदृश है, जिसमें प्राणी नाना प्रकार की योनियों में सतत गमनागमन करता रहता है। तीन ही लोक हैं, तीन ही वेद कहे गये हैं, तीन संध्यायें हैं, तीन स्वर हैं, तीन अग्नि हैं, तीन गुण (सत्, रज, तम) बतलाये गये हैं तथा तीन अक्षरों में सभी कुछ विद्यमान है। अतः इन तीन अक्षरों तथा अर्द्धाक्षर का भी योगी को अध्ययन करना चाहिए ॥ १३३-१३५ ॥ तेन सर्वमिदं प्रोतं तत्सत्यं तत्परं पदम्। पुष्पमध्ये यथा गन्धः पयोमध्ये यथा घृतम् ॥ १३६ ॥ तिलमध्ये यथा तैलं पाषाणेष्विव काञ्चनम्। हृदि स्थाने स्थितं पद्मं तस्य वक्त्रमधोमुखम् ॥१३७॥ ऊर्ध्वनालमधोबिन्दुस्तस्य मध्ये स्थितं मनः। अकारे रेचितं पद्ममुकारेणैव भिद्यते ॥ १३८ ॥ मकारे लभते नादमर्धमात्रा तु निश्चला। शुद्धस्फटिकसंकाशं निष्कलं पापनाशनम् ॥१३९॥ सभी कुछ उसी (तीन अक्षरों) में पिरोया हुआ है, वही सत्यस्वरूप है, वही शाश्वत परमपद है। जैसे- पुष्प में सुगन्ध होती है, दुग्ध में घृत सन्निहित है, तिलों में तेल उत्पन्न होता है और प्रस्तर खण्ड में स्वर्ण निहित है, वैसे ही वह भी सभी में व्याप्त है। हृदय-संस्थान में जो कमल-पुष्प स्थित है, उसका मुख नीचे की ओर है एवं उसकी नाल (दण्डी) ऊर्ध्व की ओर है। नीचे बिन्दु है, उसी के मध्य में मन प्रतिष्ठित है। 'अ' कार में रेचित किया हुआ हृदय कमल का 'उ' कार से भेदन किया जाता है एवं 'म' कार में नाद (ध्वनि) को प्राप्त होता है। अर्द्ध मात्रा निश्चल, शुद्ध स्फटिक के समान निष्कल एवं पापनाशक है ॥ १३६-१३९ ॥ लभते योगयुक्तात्मा पुरुषस्तत्परं पदम्। कूर्मः स्वपाणिपादादिशिरश्चात्मनि धारयेत् ॥ १४० ॥ एवं द्वारेषु सर्वेषु वायुपूरितरेचितः। निषिद्धं तु नवद्वारे ऊर्ध्वं प्राङ्निःश्वसस्तथा ॥ १४१ ॥ इस प्रकार योग से संयुक्त हुआ योगी पुरुष मुक्तावस्था को प्राप्त कर लेता है। जिस तरह से कच्छप अपने हाथ, पैर एवं सिर को अपने अन्दर प्रतिष्ठित कर लेता है, उसी तरह से सभी द्वारों से भर करके दबाया हुआ वायु, नौ द्वारों के बन्द होने से ऊर्ध्व की ओर गमन कर जाता है ॥ १४०-१४१ ॥ घटमध्ये यथा दीपो निवातं कुम्भकं विदुः। निषिद्धैर्नवभिर्द्वारैर्निर्जने निरुपद्रवे ॥ निश्चितं त्वात्ममात्रेणावशिष्टं योगसेवयेत्युपनिषत् ॥१४२॥ जिस तरह वायुरहित घड़े के मध्य में (स्थिर लौ वाला) दीपक रखा होता है, उसी तरह से कुम्भक को जानना चाहिए। इस योग-साधना में नौ द्वारों के अवरुद्ध किये जाने पर सुनसान एवं निरुपद्रव स्थान में आत्मतत्त्व ही मात्र शेष रहता है। ऐसा ही यह योगतत्त्व उपनिषद् है ॥ १४२ ॥ ॐ सह नाववतु............. इति शान्तिः ॥ ॥ इति योगतत्त्वोपनिषत्समाप्ता ॥