भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 297, कुल 414 में से

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पृष्ठ 297

॥ संन्यासोपनिषद् ॥ यह उपनिषद् सामवेद से सम्बद्ध है। इसमें कुल दो अध्याय हैं। प्रथम अध्याय में संन्यास क्या है? कैसे ग्रहण किया जाता है? उसके लिए कैसा आचार-व्यवहार होना चाहिए आदि का विशद वर्णन है। दूसरा अध्याय काफी बड़ा है। इसकी शुरुआत साधन चतुष्टय (विवेक, वैराग्य, षट्सम्पत्ति, मुमुक्षुत्व) से की गई है। संन्यास का अधिकारी कौन है? इसकी विस्तृत गवेषणा की गई है। संन्यासी का भेद बताते हुए १. वैराग्य संन्यासी २. ज्ञान संन्यासी ३. ज्ञान-वैराग्य संन्यासी और ४. कर्म संन्यासी की विस्तृत व्याख्या की गई है। आगे चलकर छः प्रकार के संन्यास का क्रम उल्लिखित हुआ है-कुटीचक, बहूदक, हंस, परमहंस, तुरीयातीत और अवधूत। इसी क्रम में आत्मज्ञान की स्थिति और स्वरूप का भी वर्णन उपनिषद्कार ने कर दिया है। संन्यासी के लिए आचरण की पवित्रता और भिक्षा में मिले स्वल्प भोजन में ही संतुष्ट होने का विधान बताया गया है। उसे स्त्री, भोग आदि शारीरिक आनन्द प्राप्ति से दूर रहने का निर्देश है। इस प्रकार आहार-विहार का संयम बरतते हुए नित्य प्रति आत्म चिन्तन में तल्लीन रहना चाहिए। ॐकार का जप करते रहना चाहिए-इसी से उसके अन्तःकरण में ब्रह्म का प्रकाश प्रकट होता है और वह मोक्ष प्राप्ति का अधिकारी बनता है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ आप्यायन्तु ............इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-आरुण्युपनिषद् ) ॥ प्रथमोऽध्यायः ॥ अथातः संन्यासोपनिषदं व्याख्यास्यामो योऽनुक्रमेण संन्यस्यति स संन्यस्तो भवति। कोऽयं संन्यास उच्यते। कथं संन्यस्तो भवति। य आत्मानं क्रियाभिर्गुप्तं करोति मातरं पितरं भार्यां पुत्रान्बन्धूननुमोदयित्वा ये चास्यर्त्विजस्तान्सर्वांश्र्च पूर्ववद्वृणीत्वा वैश्वानरेष्टिं निर्वपेत्स- र्वस्वं दद्याद्यजमानस्य गा ऋत्विजः सर्वैः पात्रैः समारोप्य यदाहवनीये गार्हपत्ये वान्वाहार्यपचने सभ्यावसथ्ययोश्च प्राणापानव्यानोदानसमानान्सर्वान्सर्वेषु समारोपयेत्। सशिखान्केशान्विसृज्य यज्ञोपवीतं छित्त्वा पुत्रं दृष्ट्वा त्वं यज्ञस्त्वं सर्वमित्यनुमन्त्रयेत्। यद्यपुत्रो भवत्यात्मानमेवेमं ध्यात्वा- ऽनवेक्षमाणः प्राचीमुदीचीं वा दिशं प्रव्रजेच्च। चतुर्षु वर्णेषु भिक्षाचर्यं चरेत्। पाणिपात्रेणाशनं कुर्यात् औषधवदशनमाचरेत्। औषधवदशनं प्राश्नीयात्। यथालाभमश्रीयात्प्राणसंधारणार्थं यथा मेदोवृद्धिर्न जायते। कृशो भूत्वा ग्राम एकरात्रं नगरे पञ्चरात्रं चतुरो मासान्वार्षिकान्ग्रामे वा नगरे वापि वसेत्। पक्षा वै मासो इति द्वौ मासौ वा वसेत् । विशीर्णवस्त्रं वल्कलं वा प्रतिगृह्णीयान्नान्यत्प्रतिगृह्णीयाद्यद्यशक्तो भवति क्लेशस्तस्तप्यते तप इति। यो वा एवं क्रमेण संन्यस्यति यो वा एवं पश्यति किमस्य यज्ञोपवीतं कास्य शिखा कथं वास्योपस्पर्शनमिति। तं होवाचेदमेवास्य तद्यज्ञोपवीतं यदात्मध्यानं विद्या शिखा नीरैः सर्वत्रावस्थितैः कार्यं निर्वर्तयन्नुदरपात्रेण जलतीरे निकेतनम्। ब्रह्मवादिनो वदन्त्यस्तमित आदित्ये कथं वास्योपस्पर्शनमिति। तान्होवाच यथाहनि तथा रात्रौ नास्य नक्तं न दिवा तदप्येतदृषिणोक्तम्। सकृद्दिवा हैवास्मै भवति य एवं विद्वानेतेनात्मानं संधत्ते ॥ १ ॥

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