भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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अध्याय २ मन्त्र ९ ३०७ संन्यासे निश्चयं कृत्वा पुनर्न च करोति यः । स कुर्यात्कृच्छ्रमात्रं तु पुनः संन्यस्तुमर्हति ॥ २ ॥ जो (साधक) संन्यास का निश्चय कर ले और फिर उसे स्वीकार न करे, तो वह कृच्छ्र (कठोर-तप) व्रत करने पर ही दोबारा संन्यास धर्म ग्रहण कर सकता है ॥ २ ॥ संन्यासं पातयेद्यस्तु पतितं न्यासयेत्तु यः । संन्यासविघ्नकर्ता च त्रीनेतान्पति-तान्विदुः ॥ ३ ॥ जो (व्यक्ति) संन्यास से पतित (गिर) हो जाते हैं, जो पतित को संन्यास की दीक्षा प्रदान करते हैं अथवा जो संन्यास धर्म ग्रहण करने में बाधा उत्पन्न करते हैं, वे तीनों ही (महा) पतित कहे गये हैं ॥ ३ ॥ अथ षण्डः पतितोऽङ्गविकलः स्त्रैणो बधिरोऽर्भको मूकः पाषण्डश्चक्री लिङ्गी कुष्ठी वैखानसहरद्विजौ भृतकाध्यापकः शिपिविष्टोऽनग्निको नास्तिको वैराग्यवन्तोऽप्येते न संन्यासार्हाः । संन्यस्ता यद्यपि महावाक्योपदेशे नाधिकारिणः ॥ ४ ॥ नपुंसक, पतित, अङ्गहीन, स्त्रैण (नारी स्वभाव वाला), बधिर, बालक, वाचाल, पाखण्डी, चक्री (चक्र चिह्न से अंकित अपराधी या कुचक्र रचने वाला), कुष्ठी, वैखानस एवं ब्राह्मण पद से भ्रष्ट, वेतनभोगी अध्यापक, अजितेन्द्रिय, अग्निहोत्र से रहित, नास्तिक विरक्त होते हुए भी संन्यास-दीक्षा के उपयुक्त नहीं होते। यदि कहीं वे संन्यासी हो भी जाएँ, तब भी वे महावाक्य के उपदेश में पूर्ण सक्षम अधिकारी नहीं होते ॥ ४ ॥ आरूढपतितापत्यं कुनखी श्यावदन्तकः । क्षयीतथाङ्गविकलो नैव संन्यस्तुमर्हति ॥ ५ ॥ पतित की सन्तान, निकृष्ट नख से युक्त, मैले-दुर्गन्धयुक्त दाँत वाले, क्षयरोग ग्रस्त, विकलांग आदि संन्यास-धर्म की दीक्षा ग्रहण करने योग्य नहीं होते ॥ ५ ॥ संप्रत्यवसितानां च महापातकिनां तथा । व्रात्यानामभिशस्तानां संन्यासं नैव कारयेत् ॥ ६ ॥ जिन्हें अकस्मात् वैराग्य हो गया हो, महापातकी, व्रात्य (संस्कारहीन) एवं लोक में निंदित व्यक्तियों को संन्यास की दीक्षा नहीं देनी चाहिए ॥ ६ ॥ व्रतयज्ञतपोदानहोमस्वाध्यायवर्जितम् । सत्यशौचपरिभ्रष्टं संन्यासं नैव कारयेत् । एते नार्हन्ति संन्यासमात्रेण विना क्रमम् ॥ ७ ॥ जो (मनुष्य) व्रत, यज्ञ, तप, दान, होम और स्वाध्याय-रहित हैं, सत्य एवं शुचिता से विहीन हैं, उन्हें संन्यास की दीक्षा नहीं देनी चाहिए। इस तरह के लोग चाहें तो 'आतुर संन्यासी' हो सकते हैं; किन्तु ऐसे लोग संन्यास के नियमानुसार अधिकारी नहीं हो सकते ॥ ७ ॥ ॐ भूः स्वाहेति शिखामुत्पाट्य यज्ञोपवीतं बहिर्न निवसेत् । यशो बलं ज्ञानं वैराग्यं मेधां प्रयच्छेति यज्ञोपवीतं छित्त्वा ॐ भूः स्वाहेत्यप्सु वस्त्रं कटिसूत्रं च विसृज्य संन्यस्तं मयेति त्रिवारमभिमन्त्रयेत् ॥ ८ ॥ 'ॐ भूः स्वाहा' मन्त्र पढ़कर शिखा (चोटी) को दूर कर दे अर्थात् काट दे; किन्तु यज्ञोपवीत को रहने दे। 'हे यज्ञ ! (आप हमें) बल, ज्ञान, वैराग्य एवं मेधा को प्रदान करें, इस प्रकार कहकर यज्ञोपवीत को छिन्न- भिन्न कर दे। 'ॐ भूः स्वाहा' मंत्र पढ़कर वस्त्र एवं कटि-सूत्र को जलाशय में विसर्जित करके 'संन्यस्तं मया' (मैंने संन्यास ग्रहण कर लिया), इस मंत्र का उच्चारण तीन बार करना चाहिए ॥ ८ ॥ संन्यासिनं द्विजं दृष्ट्वा स्थानाच्चलति भास्करः । एष मे मण्डलं भित्त्वा परं ब्रह्माधिगच्छति ॥९ ॥ संन्यासी एवं द्विज को देखकर भास्कर अपने स्थल से चलायमान होने लगता है कि कहीं यह हमारे मण्डल को भेद करके परब्रह्म में न समा जाए ॥ ९ ॥