१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३१२ संन्यासोपनिषद् मुझ परम ईश्वर तथा शिव स्वरूप को नमस्कार है। यह (आत्मा) बैठता हुआ आसीन नहीं होता, जाते हुए भी नहीं जाता, शान्त रहते हुए भी व्यवहार में लगा रहता है, कार्य करता हुआ भी कभी आसक्त नहीं होता॥ सुलभश्चायमत्यन्तं सुज्ञेयश्चामबन्धुवत्। शरीरपद्मकुहरे सर्वेषामेव षट्पदः ॥५०॥ यह (आत्मा) सुलभ है, आप्त बन्धु के सदृश है एवं शरीर रूपी कमल पुष्प में भ्रमर की भाँति है॥५०॥ न मे भोगस्थितौ वाञ्छा न मे भोगविसर्जने। यदायाति तदायातु यत्प्रयाति प्रयातु तत् ॥५१॥ न तो मुझ (आत्मा) को भोग करते रहने की इच्छा है और न ही भोग को त्यागने की, जो आता हो, वह आ जाए एवं जो जाना चाहता हो, वह चला जाये ॥ ५१ ॥ मनसा मनसि च्छिन्ने निरहंकारतां गते। भावेन गलिते भावे स्वस्थस्तिष्ठामि केवलः ॥५२॥ मन से मन के अलग हो जाने पर, अहंकार के विसर्जित हो जाने पर तथा भाव के विनष्ट हो जाने पर मैं (आत्मा) केवल स्वस्थ रूप में स्थित रहता हूँ ॥ ५२ ॥ निर्भावं निरहंकारं निर्मनस्कमनीहितम्। केवलास्पन्दशुद्धात्मन्येव तिष्ठति मे रिपुः ॥५३॥ (मैं) भाव शून्य, अहंकाररहित, मनः शून्य, चेष्टारहित, स्पन्द विहीन तथा केवल शुद्ध आत्मा स्वरूप हूँ। मेरा शत्रु कहाँ हो सकता है ? ॥ ५३ ॥ तृष्णारज्जुगणं छित्त्वा मच्छरीरकपञ्जरात् । न जाने क्व गतोड्डीय निरहंकारपक्षिणी ॥ ५४ ॥ मेरे शरीर रूपी पिंजड़े में निवास करने वाली निरहंकारिता रूपी पक्षिणी, तृष्णा रूपी रज्जु (रस्सी) को काटकर न जाने कहाँ उड़कर चली गई ॥ ५४॥ यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । यः समः सर्वभूतेषु जीवितं तस्य शोभते ॥ ५५ ॥ जिसमें अकर्तापन का भाव विद्यमान है, जिसकी बुद्धि में आसक्ति नहीं है, जो समस्त भूत-प्राणियों को समान भाव से देखता है, निश्चय ही उसी का जीवन शोभनीय है॥ ५५॥ योऽन्तःशीतलया बुद्ध्या रागद्वेषविमुक्तया। साक्षिवत्पश्यतीदं हि जीवितं तस्य शोभते ॥५६॥ जिसकी अन्तःकरण अत्यन्त शीतल है, जिसकी बुद्धि राग-द्वेष आदि से मुक्त हो चुकी है तथा जो साक्षी भाव से इस जगत् का अवलोकन करता है, ऐसे उस श्रेष्ठ संन्यासी का जीवन अत्यधिक शोभनीय है॥ येन सम्यक्परिज्ञाय हेयोपादेयमुज्झता । चित्तस्यान्तेऽर्पितं चित्तं जीवितं तस्य शोभते ॥ ५७॥ जिसको पूर्ण रूप से ज्ञान प्राप्त हो गया है, जिसने अच्छाई एवं बुराई के ध्यान का परित्याग कर दिया है तथा जिस (संन्यासी) ने चित्त को चित्त में ही संयुक्त कर दिया है, उसका ही जीवन अत्यन्त सुन्दर है ॥५७॥ ग्राह्यग्राहकसंबंधे क्षीणे शान्तिरुदेत्यलम् । स्थितिमभ्यागता शान्तिर्मोक्षनामाभिधीयते ॥ ५८ ॥ ग्राह्य एवं ग्राहक का सम्बन्ध विनष्ट हो जाने के पश्चात् स्थिर शान्ति का उदय होता है, इस कारण शान्ति को ही मोक्ष कहा जाता है ॥ ५८ ॥ भ्रष्टबीजोपमा भूयो जन्माङ्कुरविवर्जिता। हृदि जीवद्विमुक्तानां शुद्धा भवति वासना ॥ ५९ ॥ जिस प्रकार से भुना हुआ बीज अंकुर प्रकट करने में असमर्थ रहता है, उसी प्रकार जो जीवन से मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं, उन सभी के हृदय की वासना-आसक्ति प्रायः पवित्रता से युक्त हो जाती है ॥ ५९ ॥ पावनी परमोदारा शुद्धसत्त्वानुपातिनी। आत्मध्यानमयी नित्या सुषुप्तिस्थेव तिष्ठति ॥ ६० ॥ वह पतित-पावन, परम उदार, शुद्ध सत्य को आत्मसात् करने वाले, आत्मध्यान सम्पन्न एवं अपने- अपने नित्य स्वरूप में प्रतिष्ठित रहते हैं ॥ ६० ॥