१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३१४ संन्यासोपनिषद् पदं तदनुयातोऽस्मि केवलोऽस्मि जयाम्यहम्। निर्वाणोऽस्मि निरीहोऽस्मि निरंशोऽस्मि निरीप्सितः॥ ७१॥ स्वच्छतोजितता सत्ता हृद्यता सत्यता ज्ञता। आनन्दितोपशमता सदा प्रमुदितोदिता। पूर्णतोदारता सत्या कान्तिसत्ता सदैकता॥ ७२॥ इत्येवं चिन्तयन्भिक्षुः स्वरूपस्थितिमञ्जसा। निर्विकल्पस्वरूपज्ञो निर्विकल्पो बभूव ह॥ ७३॥ मैं उस अविनाशी पद का स्वरूप हूँ, केवल हूँ, जय रूप हूँ, निर्वाण, निरीह (अहंरहित), अंशरहित, निरीप्सित (इच्छारहित) स्वच्छ, वीर्यवान्, सत्ताशाली, सत्य एवं ज्ञान स्वरूप हो गया हूँ। आनन्द, उपशम, प्रसन्नता, पूर्णता, उदारता, सत्य, द्वैतरहित आदि की भावना करते हुए संन्यासी को अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित रहना चाहिए। निर्विकल्प स्वरूप का पूर्ण जानकार होकर, निर्विकल्प बन करके ही रहना चाहिए॥ ७१-७३॥ आतुरो जीवति चेत्क्रमसंन्यासः कर्तव्यः। न शूद्रस्त्रीपतितोदक्या संभाषणम्। न यतेर्दे- वपूजनोत्सवदर्शनम्। तस्मान्न संन्यासिन एष लोकः। आतुरकुटीचकयोर्भूर्लोकभुवर्लोकौ। बहूदकस्य स्वर्गलोकः। हंसस्य तपोलोकः। परमहंसस्य सत्यलोकः। तुरीयातीतावधूतयोः स्वात्मन्येव कैवल्यं स्वरूपानुसंधानेन भ्रमरकीटन्यायवत्॥ ७४॥ आतुर संन्यासी यदि संन्यास लेने की इच्छा से जीवित रहे, तभी उसे क्रम-संन्यास प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। शूद्र, स्त्री, पद-भ्रष्ट तथा रजस्वला से कभी भी सम्भाषण नहीं करना चाहिए। किसी भी देवता के पूजनोत्सव को देखने के लिए संन्यासी को कभी नहीं जाना चाहिए। वे लौकिक कार्य संन्यासी के लिए नहीं हैं। आतुर और कुटीचक का भूः एवं भुवः लोक होता है, बहूदक का स्वर्गलोक होता है, हंस का तपोलोक एवं परमहंस का स्थान सत्यलोक होता है। तुरीयातीत तथा अवधूत श्रेणी के लोग भ्रमर-कीट के सदृश अपने स्वरूप का अन्वेषण करने हुए कैवल्य (केवल आत्मतत्त्व) रूप में प्रतिष्ठित हो जाते हैं॥ ७४॥ स्वरूपानुसंधानव्यतिरिक्तान्यशास्त्राभ्यास उष्ट्रकुङ्कुमभारवद्व्यर्थः। न योगशास्त्र प्रवृत्तिः। न सांख्यशास्त्राभ्यासः। न मन्त्रतन्त्रव्यापारः। नेतरशास्त्रप्रवृत्तिर्यतेरस्ति। अस्ति चेच्छवालंकारवत्कर्माचारविद्यादूरः। न परिव्राण्नामसंकीर्तनपरो यद्यत्कर्म करोति तत्तत्फल- मनुभवति। एरण्डतैलफेनवत्सर्वं परित्यजेत्। न देवताप्रसादग्रहणम्। न बाह्यदेवाभ्यर्चनं कुर्यात्॥ ७५॥ संन्यासी के लिए अपने स्वरूप के अनुसंधान के अलावा अन्य विभिन्न शास्त्रों का निरन्तर अभ्यास करना, ऊँट के ऊपर केशर लादने के सदृश बेकार है। संन्यासी के लिए योग की प्रवृत्ति अथवा सांख्य शास्त्र का मंत्र-तंत्र का व्यापार आदि तथा किसी भी शास्त्र की प्रवृत्ति वर्जनीय है। यदि कोई संन्यासी ऐसा करता है, तो वह मृतक शव के ऊपर आभूषणों के समान है तथा संन्यासी के कर्म एवं विद्या के अनुकूल नहीं है। संन्यासी को किसी भी देवता के नाम तथा कीर्तन आदि में भाग नहीं लेना चाहिए। कारण यह है कि कोई भी कार्य करने के बाद उसका फल तो भोगना ही पड़ेगा। इसलिए एरण्ड (रेड़ी) तेल के फेन के सदृश सभी का परित्याग कर देना चाहिए। संन्यासी को न तो किसी देवी-देवता का प्रसाद ग्रहण करना चाहिए और न ही किसी बाह्य देवता आदि की पूजा ही करनी चाहिए॥ ७५॥ स्वव्यतिरिक्तं सर्वं त्यक्त्वा मधुकरवृत्त्याहारमाहरन्कृशीभूत्वा मेदोवृद्धिमकुर्वन्विहरेत्। माधुकरेण करपात्रेणास्यपात्रेण वा कालं नयेत्। आत्मसंमितमाहारमाहरेदात्मवान्यतिः॥ ७६॥ संन्यासी को चाहिए कि वह अपने अतिरिक्त सभी का त्याग करके अपने हाथ रूपी पात्र से मधुकरी