१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३१६ संन्यासोपनिषद् उपस्थानेन यत्प्रोक्तं भिक्षार्थं ब्राह्मणेन तत्। तात्कालिकमिति ख्यातं भोक्तव्यं यतिभिः सदा॥ सिद्धमन्नं यदा नीतं ब्राह्मणेन मठं प्रति। उपपन्नमिति प्राहुर्मुनयो मोक्षकाङ्क्षिणः॥८८॥ भिक्षा के लिए निकलते समय (संन्यासी को) यदि कोई ब्राह्मण उसके समीप में आकर भोजन करने को कहे, तो उस 'तात्कालिक' भिक्षा को सदा ही स्वीकार कर सकता है। यदि कोई ब्राह्मण मठ (आश्रम) में सिद्ध (तैयार) करके भोजन ले आये, तो उसे साधु 'उपपन्न' भिक्षा कहते हैं॥८७-८८॥ चरेन्माधुकरं भैक्षं यतिम्लेच्छकुलादपि। एकान्नं नतु भुञ्जीत बृहस्पतिसमादपि। याचितायाचि- ताभ्यां च भिक्षाभ्यां कल्पयेत्स्थितम्॥८९॥ यदि संन्यासी को भिक्षा को विशेष आवश्यकता पड़ जाये, तो उसे म्लेच्छ के यहाँ से भी भिक्षा माँग लेनी चाहिए; परन्तु कभी भी एक ही स्थान से आहार स्वीकार नहीं करना चाहिए। चाहे वह बृहस्पति के सदृश पूज्य का ही घर क्यों न हो? संन्यासी को सर्वदा 'याचित' अथवा 'अयाचित' भिक्षा के द्वारा निर्वाह करना सर्वथा उचित है॥८९॥ न वायुः स्पर्शदोषेण नाग्निर्दहनकर्मणा। नापो मूत्रपुरीषाभ्यां नान्नदोषेण मस्करी॥९०॥ वायु हर किसी को स्पर्श करता है, अग्नि सभी को जलाता है, जल में सभी तरह के मल-मूत्रादि डाल दिये जाते हैं, फिर भी ये सभी इन दोषों के स्पर्श से प्रदूषित नहीं होते। इसी तरह संन्यासी भी किन्हीं अन्य दोषों से दूषित नहीं होता॥९०॥ विधूमे सन्नमुसले व्यङ्गारे भुक्तवज्जने। कालेऽपराह्ने भूयिष्ठे भिक्षाचरणमाचरेत्॥९१॥ अग्नि-धूम्र एवं मूसल के शब्द से रहित, जिस जगह पर अग्नि बुझकर समाप्त हो चुकी हो तथा उपस्थित सभी लोग भोजन कर चुके हों, वहाँ पर ही योगी को मध्याह्न काल के पश्चात् भिक्षा ग्रहण करनी चाहिए॥९१॥ अभिशस्तं च पतितं पाषण्डं देवपूजकम्। वर्जयित्वा चरेद्भैक्षं सर्ववर्णेषु चापदि॥९२॥ आपत्ति कालीन स्थिति में संन्यासी निन्दनीय परिवार, पतित एवं पाखण्डी-पदच्युत का परित्याग करके समस्त वर्ण-जातियों के यहाँ से भिक्षा प्राप्त कर सकता है॥९२॥ घृतं श्वमूत्रसदृशं मधु स्यात्सुरया समम्। तैलं सूकरमूत्रं स्यात्सूपं लशुनसंमितम्॥ माषापूपादि गोमांसं क्षीरं मूत्रसमं भवेत्। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन घृतादीन्वर्जयेद्यतिः॥९३-९४॥ संन्यासी के लिए घृत कुत्ते के मूत्र के सदृश है, शहद मदिरा पान के समान है, तेल शूकर के मूत्र के समतुल्य है, लहसुन युक्त पदार्थ एवं उड़द, अपूप (मालपुआ) आदि के पदार्थ गोमांस के सदृश हैं, दूध मूत्र के सदृश है, अतः संन्यासी को सर्वदा घृत आदि से विहीन भिक्षा ही प्रयत्नपूर्वक स्वीकार करनी चाहिए॥ घृतसूपादिसंयुक्तमन्नं नाद्यात्कदाचन। पात्रमस्य भवेत्पाणिस्तेन नित्यं स्थितिं नयेत्। पाणिपात्रश्चरन्योगी नासकृद्भैक्षमाचरेत्॥९५॥ आस्येन तु यदाहारं गोवन्मृगयते मुनिः। तदा समः स्यात्सर्वेषु सोऽमृतत्वाय कल्पते॥९६॥ घृत एवं सूपादि (चटनी, मिर्च-मसाला आदि) से युक्त पकवान को कभी ग्रहण नहीं करना चाहिए। संन्यासी के लिए उसका हाथ भोजन ग्रहण करने का पात्र है। उस हाथ रूपी पात्र में सर्वदा भिक्षा ग्रहण करनी चाहिए। इस प्रकार संन्यासी को दिन में एक ही बार भोजन ग्रहण करना चाहिए। दो बार भोजन कदापि न करे। जो मुनि गौ की भाँति केवल मुख से आहार ग्रहण करता है, (संचित नहीं करता) वह सभी में समभाव प्राप्त करके अमृतत्व को प्राप्त कर लेता है॥९५-९६॥