१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३३० सुबालोपनिषद् वह विराजा में ही विलीन हो जाता है। जो विराजा प्राण के प्रति प्रकट होती है, वह प्राण में ही विलीन हो जाती है। जो प्राण, विज्ञान के प्रति प्रकट होता है, वह विज्ञान में ही अस्त होता है। जो विज्ञान, आनन्द के प्रति प्रकट होता है, वह आनन्द में ही अस्त होता है। जो आनन्द, तुरीय के प्रति प्रकट होता है, वह तुरीय में ही अस्त होता है। वह तुरीय अमृत, अभय, अशोक, अनन्त और निर्बीज ब्रह्म को प्राप्त होता है॥ १॥ [जिस-जिस संज्ञा वाली नाड़ियाँ मनुष्य में होती हैं, वे सभी मूलतः विराट् पुरुष में भी होती हैं, जिस तरह विराट् पुरुष-परमात्मा का अंश आत्मा है, वैसे ही नाड़ियाँ भी विराट् के नाड़ी तंत्र की अंग हैं। आदित्य आदि देवों का प्राकट्य और विलय उन्हीं के प्रति कहा गया है। आगे के मंत्रों में भी अधिदेवता का विलय जिन नाड़ियों में कहा गया है, वे सभी विराट् की नाड़ियाँ ही मान्य हैं।] श्रोत्रमेवाप्येति यः श्रोत्रमेवास्तमेति श्रोतव्यमेवाप्येति यः श्रोतव्यमेवास्तमेति दिशमेवाप्येति यो दिशमेवास्तमेति सुदर्शनामेवाप्येति यः सुदर्शनामेवास्तमेत्यपानमेवाप्येति योऽपानमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति यो विज्ञानमेवास्तमेति तदमृतमभयमशोकमनन्त- निर्बीजमेवाप्येतीति होवाच ॥ २ ॥ इसी प्रकार जो श्रोत्र के प्रति प्रकट होता है, वह श्रोत्र में ही अस्त होता है। जो श्रोत्र, श्रोतव्य के प्रति प्रकट होता है, वह श्रोतव्य में ही अस्त होता है। जो श्रोतव्य, दिशाओं के प्रति प्रकट होता है, वह दिशाओं में ही अस्त होता है। जो दिशाएँ, सुदर्शना के प्रति प्रकट होती हैं, वे सुदर्शना में ही अस्त होती हैं। जो सुदर्शना, अपान के प्रति प्रकट होती है, वह अपान में ही अस्त होती है। जो अपान विज्ञान के प्रति प्रकट होता है, वह विज्ञान में ही अस्त होता है। वह विज्ञान अमृत, अभय, अशोक, अनन्त और निर्बीज ब्रह्म में विलीन हो जाता है॥ २॥ नासामेवाप्येति यो नासामेवास्तमेति घ्रातव्यमेवाप्येति यो घ्रातव्यमेवास्तमेति पृथिवीमेवाप्येति यः पृथिवीमेवास्तमेति जितामेवाप्येति यो जितामेवास्तमेति व्यानमेवाप्येति यो व्यानमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत.................. होवाच ॥ ३ ॥ इसी प्रकार जो पदार्थ नासिका के प्रति (गन्धरूप में) प्रकट होते हैं, वे नासिका में ही अस्त होते हैं। जो नासिका, घ्रातव्य (सूँघे जाने योग्य) पदार्थों के प्रति प्रकट होती है, वह घ्रातव्य में ही अस्त हो जाती है। जो घ्रातव्य, पृथिवी के प्रति प्रकट होता है, वह पृथिवी में ही विलीन हो जाता है। जो पृथिवी, जिता नामक नाड़ी के प्रति प्रकट होती है, वह जिता में ही अस्त होती है। जो जिता, व्यान के प्रति प्रकट होती है, वह व्यान में ही विलीन हो जाती है। जो व्यान, विज्ञान के प्रति प्रकट होता है, वह विज्ञान में ही विलुप्त हो जाता है। वह विज्ञान, अमृत, अभय, अशोक, अनन्त और निर्बीज ब्रह्म में लय हो जाता है ॥ ३ ॥ जिह्वामेवाप्येति यो जिह्वामेवास्तमेति रसयितव्यमेवाप्येति यो रसयितव्यमेवास्तमेति वरुणमेवाप्येति यो वरुणमेवास्तमेति सौम्यामेवाप्येति यः सौम्यामेवास्तमेत्युदानमेवाप्येति य उदानमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत.................. होवाच ॥ ४ ॥ इसी प्रकार जो पदार्थ जिह्वा के प्रति प्रकट होते हैं, वे जिह्वा में ही विलीन हो जाते हैं। जो जिह्वा, रसयितव्य के प्रति प्रकट होती है, वह रसयितव्य में ही विलीन हो जाती है। जो रसयितव्य, वरुण को प्राप्त होता है, वह वरुण में ही विलीन हो जाता है। जो वरुण, सौम्या नामक नाड़ी को प्राप्त होता है, वह सौम्या में ही विलीन हो जाता है। जो सौम्या, उदान के प्रति प्रकट होती है, वह उदान में ही अस्त हो जाती है। जो उदान, विज्ञान के प्रति प्रकट होता है, वह विज्ञान में ही लय हो जाता है। वह विज्ञान अमृत, भयरहित, शोकरहित, अन्तरहित और बीजरहित ब्रह्म को प्राप्त होता है ॥ ४॥