१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३३२ सुबालोपनिषद् विज्ञान में ही विलय हो जाता है तथा यह विज्ञान, तुरीय के समक्ष जाता है, इस कारण से यह मृत्युरहित, भयरहित, शोकरहित, अन्तरहित एवं अबीज तुरीयावस्था को प्राप्त कर लेता है ॥ ८ ॥ पायुमेवाप्येति यः पायुमेवास्तमेति विसर्जंयितव्यमेवाप्येति यो विसर्जंयितव्य- मेवास्तमेति मृत्युमेवाप्येति यो मृत्युमेवास्तमेति मध्यमामेवाप्येति यो मध्यमामेवास्तमेति प्रभञ्जनमेवाप्येति यः प्रभञ्जनमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तद्.......... होवाच ॥ ९॥ (ऐसा कहने के अनन्तर फिर उन्होंने कहा-) जो गुदा को प्राप्त करता है, वह गुदा में ही विलय को पाता है, यह गुदा, विसर्जन योग्य मल त्याग को प्राप्त करता है, अतः यह त्यागने योग्य में ही विलय को प्राप्त करता है, यह मलत्याग, मृत्यु को प्राप्त करता है, इस कारण यह मृत्यु में ही विलीन हो जाता है,यह मृत्यु, मध्यमा नाड़ी को प्राप्त करती है, इसलिए यह मध्यमा में ही विलीन होती है,यह मध्यमा, प्रभञ्जन नामक वायु को प्राप्त करती है, अतः यह प्रभञ्जन वायु में ही विलय को प्राप्त होती है,यह प्रभञ्जन वायु विज्ञान को प्राप्त होती है, इस कारण प्रभञ्जन वायु का अस्त विज्ञान में ही होता है। यह विज्ञान, तुरीय के पास जाता है, इसलिए वह मृत्युरहित, भयविहीन, अशोक, अनन्त एवं निर्बीज तुरीयावस्था को प्राप्त हो जाता है ॥ ९ ॥ उपस्थमेवाप्येति य उपस्थमेवास्तमेत्यानन्दयितव्यमेवाप्येति य आनन्दयितव्यमे- वास्तमेति प्रजापतिमेवाप्येति यः प्रजापतिमेवास्तमेति नासीरामेवाप्येति यो नासीरामेवास्तमेति कुर्मिरमेवाप्येति यः कुर्मिरमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत ........ होवाच ॥ १० ॥ (यह कहने के पश्चात् पुनः उन्होंने कहना प्रारंभ किया कि) जो उपस्थ को प्राप्त करता है, वह उपस्थ में ही लीन हो जाता है और यह उपस्थ, आनन्द स्वरूप विषयों को प्राप्त करता है, इस कारण यह आनन्द में विलय हो जाता है। यह आनन्द, प्रजापति के पास जाता है, इस कारण यह प्रजापति में विलीन हो जाता है। यह प्रजापति, नासीरा नाड़ी को ओर प्रस्थान करता है, अतः यह नासीरा में ही विलीन हो जाता है। यह नासीरा, कुर्मिर नाड़ी की ओर गमन करता है, इस कारण से यह कुर्मिर नाड़ी में ही लय होती है। यह कुर्मिर विज्ञान की ओर जाती है, इसलिए इसका विलय विज्ञान में ही हो जाता है। यह विज्ञान तुरीय को प्राप्त करता है, इस कारण यह मृत्युरहित, भयरहित, शोकविहीन, अनन्त एवं अबीज तुरीयावस्था को ही प्राप्त करता है ॥ १० ॥ मन एवाप्येति यो मन एवास्तमेति मन्तव्यमेवाप्येति यो मन्तव्यमेवास्तमेति चन्द्रमेवाप्येति यश्चन्द्रमेवास्तमेति शिशुमेवाप्येति यः शिशुमेवास्तमेति श्येनमेवाप्येति यः श्येनमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत............. होवाच ॥ ११ ॥ (इसके बाद उन्होंने पुनः कहा कि) जो मन को प्राप्त करता है, वह मन में ही विलीन हो जाता है। यह मन, विचारणीय विषय को प्राप्त करता है, इस कारण से यह विचारणीय विषयों में लीन हो जाता है, यह विचारणीय, चन्द्रमा को तरफ गमन कर जाता है, इसलिए यह चन्द्रमा में ही लय हो जाता है, यह चन्द्रमा, शिशु नाड़ी को ओर गमन करता है, इस कारण यह शिशु में ही विलीन हो जाता है, यह शिशु नाड़ी श्येन की ओर गमन करती है, इस कारण वह श्येन में ही लय होती है, यह श्येन, विज्ञान को तरफ गमन करता है, इस कारण से यह विज्ञान में ही विलीन हो जाता है तथा यह विज्ञान, तुरीय के प्रति गमन करता है, इस कारण से यह मृत्युरहित, भयरहित, अशोक, अनन्त एवं अबीज तुरीयावस्था को प्राप्त होता है ॥ ११ ॥ बुद्धिमेवाप्येति यो बुद्धिमेवास्तमेति बोद्धव्यमेवाप्येति यो बोद्धव्यमेवास्तमेति ब्रह्माणमेवाप्येति यो ब्रह्माणमेवास्तमेति सूर्यामेवाप्येति यः सूर्यामेवास्तमेति कृष्णामेवाप्येति यः कृष्णामेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत............. होवाच ॥ १२ ॥