भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 414 में से

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॥ आत्मोपनिषद् ॥ यह उपनिषद् अथर्ववेद से सम्बद्ध है। नाम के अनुसार इस उपनिषद् में आत्म तत्त्व की विभिन्न स्थितियों-आत्मा, अन्तरात्मा एवं परमात्मा को स्पष्ट किया गया है। शरीर एवं इन्द्रियादि में सक्रिय चेतन को आत्मा, प्रकृति के विभिन्न घटकों, पंचतत्त्वों आदि में संव्याप्त को अन्तरात्मा तथा इन सब घटकों से परे चेतन प्रवाह को परमात्मा-ब्रह्म कहा गया है। सूर्य जैसे राहुग्रस्त दिखता है; पर होता नहीं, उसी प्रकार आत्मा भी अज्ञानग्रस्त दिखता है; पर होता नहीं, यह कहकर ऋषि ने सूर्यग्रहण के तथ्य के साथ ही जीवन के तथ्य को भी उजागर किया है। रस्सी में सर्पबोध तथा सर्प का केंचुली से मुक्त होने के उदाहरणों से संसार रूपी भ्रमों और आत्मा की सहज मुक्तावस्था को समझाया गया है। ब्रह्म को सभी उपमाओं, सम्बोधनों और शब्दार्थों से परे सिद्ध किया गया है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ भद्रं कर्णेभिः .......................इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-अथर्वशिर उपनिषद् ) अथाङ्गिरास्त्रिविधः पुरुषोऽजायतात्माऽन्तरात्मा परमात्मा चेति ॥ १-क ॥ अङ्गिरा (अंग, अंगी, अंग-ज्ञ आदि दृष्टि से) पुरुष (परमात्मा) त्रिविध 'आत्मा, अन्तरात्मा और परमात्मा' रूप में प्रादुर्भूत (प्रकट) हुआ ॥ १-क॥ त्वक् चर्ममांसरोमाङ्गुष्ठाङ्गुल्यः पृष्ठवंशनखगुल्फोदरनाभिमेढ्रकट्यूरुकपोलश्रोत्र भ्रूललाटबाहुपार्श्वशिरोधमनिकाऽक्षीणि भवन्ति जायते म्रियत इत्येष बाह्यात्मा ॥ १-ख ॥ (अब क्रमशः आत्मा, अन्तरात्मा और परमात्मा का स्वरूप वर्णित कर रहे हैं-) जो त्वक् (त्वचा), चर्म, मांस, रोम (बाल), अँगूठा, अँगुलियों, पीठ (पृष्ठभाग), नख, गुल्फ (टखनों), उदर (पेट), नाभि, जननेन्द्रिय, कटि (कमर), जंघा, कपोल, भौंह, मस्तक, भुजाओं, पार्श्वभाग, सिर एवं आँखों आदि (स्थूल शरीर) के माध्यम से जन्म-मरण के चक्र में घूमता है, वह आत्मा है ॥ १-ख ॥ अथान्तरात्मा नाम पृथिव्यापस्तेजोवायुराकाशेच्छाद्वेषसुखदुःखकाममोह विकल्पनादिभिः स्मृतिलिङ्ग उदात्तानुदात्तह्रस्वदीर्घप्लुतस्खलितगर्जितस्फुटितमुदितनृत्तगीतवादित्रप्रलय विजृम्भितादिभिः श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्त्ता विज्ञानात्मा पुरुषः पुराणन्याय - मीमांसाधर्मशास्त्राणीति श्रवणघ्राणाकर्षणकर्मविशेषणं करोत्येषोऽन्तरात्मा ॥ १-ग ॥ अन्तरात्मा (दृश्य पदार्थों में अव्यक्त रूप से स्थित अन्तर्यामी चेतन) वह है, जो पृथ्वी, जल, सुख-दुःख आदि (गुण), काम, मोह, तर्क-वितर्क आदि, स्मृति, लिंग, उदात्त, अनुदात्त, ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत आदि (स्वर भेद), स्खलित, गर्जित (मेघ शब्द), स्फुटित, मुदित, नृत्य, गीत, वादित (आदि ध्वनि रूप), प्रलय, विजृम्भण (विकास) आदि के द्वारा श्रवण करने वाला, सूँघने वाला, रस लेने वाला, मनन करने वाला, जानने वाला, कार्य करने वाला, विज्ञानात्मा, पुराण, न्याय, मीमांसा आदि जो धर्मशास्त्रों का ज्ञाता, श्रवण, घ्राण (सूँघना), आकर्षण एवं कार्य विशेष को पूर्ण करता है ॥ १-ग ॥

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