१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मतत्त्व ३८२ परिशिष्ट एक ही वाक्य से स्पष्ट हो जाती है - ब्रह्मणि वेदे चरति इति ब्रह्मचारी अर्थात् जो वेद-ब्रह्म के चिन्तन-मनन में नित्य तल्लीन रहता है, वह ब्रह्मचारी है। आश्रमोपनिषद् के प्रथम मंत्र में ब्रह्मचारी के चार भेद वर्णित हैं। गायत्र, ब्राह्म (ब्राह्मण), प्राजापत्य और बृहन् (बृहत्)- तत्र ब्रह्मचारिणश्चतुर्विधा भवन्ति गायत्रो ब्राह्मः प्राजापत्यो बृहन्निति। इनमें जो ब्रह्मचारी उपनयनोपरान्त तीन रात्रि तक अलवण (बिना नमक का) भोजन ग्रहण करके गायत्री मंत्र का जप करते हैं, उन्हें गायत्र कहते हैं-यं उपनयनादूर्ध्वं ............गायत्रीमधीते स गायत्रः (आश्रमो० १)। जो अड़तालीस वर्ष पर्यन्त वेद के पठन्-पाठन हेतु ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं अर्थात् प्रत्येक वेद का पाठ १२ वर्ष तक करते हुए ब्रह्मचर्य पालते हैं, वे ब्राह्म या ब्राह्मण कहलाते हैं। जो २४ वर्ष तक गुरुकुल में रहे। (ध्यातव्य है कि प्रचलित ब्राह्मण शब्द की व्याख्या १०८ उपनिषद् के ज्ञानखण्ड के परिभाषाकोश परिशिष्ट में की जा चुकी है। यहाँ ब्राह्म के पर्याय स्वरूप लिखा गया ब्राह्मण शब्द ब्रह्मचारी के एक भेद के सन्दर्भ में आया है।) जो गृहस्थ होते हुए केवल ऋतुकाल में अपनी पत्नी से ही संसर्ग करने वाले तथा परदारा (दूसरे की स्त्री) को त्यागने या निषिद्ध मानने वाले हैं, उन्हें प्राजापत्य कहते हैं-स्वदारनिरत ऋतुकालाभिगामी सदा परदारवर्जी प्राजापत्यः (आश्रमो० १)। उन्हें भी प्राजापत्य ही कहा जाता है, जो ४८ वर्ष तक गुरुकुल में निवास करें। जो (ब्रह्मचारी) जीवन पर्यन्त गुरु का परित्याग न करे, ऐसा नैष्ठिक बृहन् या बृहत् कहलाता है- आ प्रायणाद्गुरोरपरित्यागी नैष्ठिको बृहन्निति (आश्रमो० १)। इस प्रकार आचरण भेद से ब्रह्मचारी के ये चार प्रकार हैं। २१७. ब्रह्मतत्त्व—द्र०-ज्ञानखण्ड-ब्रह्म-परब्रह्म। २१८. ब्रह्मनिष्ठ—द्र०-ज्ञानखण्ड-ब्रह्म विद्या। २१९. ब्रह्मपुर—द्र०-अष्टदल कमल। २२०. ब्रह्मयज्ञ—द्र०-वानप्रस्थ। २२१. ब्रह्मरन्ध्र—द्र०-ज्ञानखण्ड। २२२. ब्रह्मलीन—द्र०-ज्ञानखण्ड-जीवन्मुक्त। २२३. ब्रह्मविद्या—द्र०-ज्ञानखण्ड। २२४. ब्रह्मवेत्ता—द्र०-ज्ञानखण्ड। २२५. ब्रह्माण्ड—द्र०-ज्ञानखण्ड। २२६. ब्रह्मानन्द—द्र०-अद्वयानन्द। २२७. ब्राह्म—द्र०-ब्रह्मचारी। २२८. ब्राह्मण—द्र०-ज्ञानखण्ड। २२९. भद्रासन—द्र०-आसन। २३०. भवसागर—द्र०-ज्ञानखण्ड- जीवन्मुक्त। २३१. भिक्षु—द्र०-अवधूत। २३२. भूचर सिद्धि—योग साधनाओं से विभिन्न प्रकार की सिद्धियों का वर्णन योग शास्त्रों में मिलता है। अष्टसिद्धियों का कई स्थलों पर उल्लेख है। ये हैं- अणिमा, गरिमा, लघिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व। योग सम्बन्धी उपनिषदों में शरीर के नीरोग रहने की सिद्धि, दूर-दर्शन, दूर-श्रवण, दूरस्थ व्यक्ति की प्राणशक्ति द्वारा सहायता करना आदि अनेकों सिद्धियों का विवेचन है। कुछ सिद्धियाँ ऐसी भी हैं, जिनका प्रयोग या तो निषिद्ध है अथवा इनका प्रयोग बहुत ही सावधानी पूर्वक करने का निर्देश दिया गया है। प्राणायाम के अनेक प्रकारों द्वारा अनेकप्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। इन्हीं में से एक सिद्धि है- भूचर सिद्धि। दत्तात्रेय स्मृति और योगतत्त्वोपनिषद् में इसका उल्लेख है। केवल- कुम्भक प्राणायाम सिद्ध हो जाने पर योगी के लिए त्रिलोक में कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता। केवल-कुम्भक प्राणायाम सिद्ध हो जाने पर रेचक और पूरक का त्याग कर दिया जाता है। उसके बाद अभ्यास के समय निकले पसीने को शरीर में ही मल लिया जाता है। देह में कम्प और दर्दुर भाव (मेंढक के उछलने जैसी चेष्टा) के बाद योगी का शरीर पद्मासन स्थिति