भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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४०४ मन्त्रानुक्रमणिका मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण | मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण ईशाधिष्ठितावरण | पैङ्ग० १.५ | ऋतुक्षौरं कुटी .... | ना०परि० ७.४ ईशानं परमम् | पं०ब्र०१९ | ऋतुरास्म्यार्तवो | कौ०ब्रा० १.६ ईशानोऽस्मि | ब्र०वि० ९३ | ऋतुसन्धौ मुण्डयेत् | शाट्या० २२ ईश्वरत्वमवाप्नोति | ब्र०वि० २५ | एक एव चरेन्नित्यम् | ना०परि० ३.५३ ईश्वरो जीवकलया | याज्ञ० १३ | एक एव हि | ब्र०बि० १२ ईहानीहामयैरन्तर्या | संन्या० २.४५ | एक एवात्मा | ब्र०बि० ११ ईहितानीहितैः | संन्या० २.६७ | एक तत्त्वदृढाभ्यासात् | शाण्डि० १.७.२८ उक्तविकल्पं | मं०ब्रा० १.४.२ | एकं पादम् | शाण्डि० १.३.४ उक्थं ब्रह्मेति ह स्माह | कौ०ब्रा० ६ | एकमेवाद्वितीयम् | मैत्रे० २.१५ उच्चैर्जपश्व | जा०द० २.१६ | एकरात्रं .... नगरे | ना०परि० ४.१४ उच्चैर्जपादुप्रांशुश्च | जा०द० २.१५ | 'एकरात्रं ... पत्तने | ना०परि० ४.२० उड्ड्यानाख्यो हि | यो०त० १२० | एकवारं प्रतिदिनम् | यो०त० ६८ उत्तमा तत्त्वचिन्तैव | मैत्रे० २.२१ | एकवासा ... चरेत् | ना०परि० ४.१७ उत्तरं त्वमनस्कम् | मं०ब्रा० १.३.४ | एकवासा-संवसेत् | ना०परि० ३.३१ उत्थानं च | जा०द० ६.४४ | एकशूरेन्महीमेतां | ना०परि० ५.५२ उत्पत्तिस्थितिं | यो०त० १८ | एकसंख्याविहीनोऽस्मि | मैत्रे० ३.७ उदान ऊर्ध्वगमनं | जा०द० ४.३२ | एकाकी चिन्तयेद्ब्रह्म | ना०परि० ३.६० उदान संज्ञो | जा०द० ४.२९ | एकाकी निःस्पृहस्तिष्ठेन्न | ना०परि० ३.५९ उद्गारादिगुणः | जा०द० ४.३३ | एकात्मके परे | अध्या० २५ उद्गीथमेतत्परमं तु | ना०परि० ९.७ | एकान्त ध्यानयोगाच्च | शाण्डि० १.७.२९ उद्भूतोऽस्मि | संन्या० २.४८ | एकात्रं मदमात्सर्यम् | संन्या० २.१०४ उन्मीलित .... | शारी० १५ | एकीभूतः सुषुप्तस्थः | ना०परि० ८.१५ उपस्थमेवाप्येति | सुबा० ९.२० | एकेन लोहमणिना | पं०ब्र० ३६ उपस्थानेन | संन्या० २.८७ | एकेनैवस्तु पिण्डेन | पं०ब्र० ३५ उपस्थोऽध्यात्मम् | सुबा० ५.१४ | एको देवः सर्वभूतेषु | ब्रह्म० १६ उपाधिनाशाद्ब्रह्मैव | आत्म० २१ | एकोनविंशति मुखः | ना०परि० ८.१५ उभयमपि मनोयुक्तम् | मं०ब्रा० १.३.२ | एकोभिक्षुर्यथोक्तम् | ना०परि० ३.५६ उल्काहस्तो यथा | ब्र०वि० ३६ | एको वशी | ब्रह्म० १७ ऊर्णनाभिर्यथा | ब्रह्म० २० | एकोऽहमविकलोऽहम् | आ०बो० २.६ ऊर्ध्वनालमधोबिन्दु | यो०त० १३८ | एतच्चतुष्टयम् | ना०परि० ४.४ ऊर्ध्वपुण्ड्रं कुटी ... | ना०परि० ७.३ | एतज्ज्ञेयं नित्यमेव | ना०परि० ९.१२ ऊर्ध्वाम्नायः | निर्वा० १२-२४ | एतत्तु परमम् | ब्र०वि० ४५ ऊर्ध्वरेतम् | जा०द० ९.२ | एतद्वै ब्रह्म दीप्यते | कौ०ब्रा० २.१३ ऊर्ध्वं सात्त्विको | शारी० १२ | एतद्वै सत्येन | सुबा० ३.३ ऊर्वोरुपरि विप्रेन्द्र | जा०द० ३.५ | एतन्निर्वाणदर्शनं | निर्वा० ६१ ऊर्वोर्मध्ये | क्षुरि० १४ | एतस्माज्जायते प्राणो | कैव० १५ ऋग्वेदो गार्हपत्यम् च पृथिवी | ब्र०वि० ४ | एतस्मिन्वसते | ब्र०वि १९ ऋग्वेदो गार्हपत्यम् च मन्त्राः | पं०ब्र० ६ | एतां विद्याम् | सुबा० ७.२ ऋजुकायः | यो० त० ३६ | एतां विद्यामपात्तरतमाय | अध्या० ७१