१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ
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४१४ मन्त्रानुक्रमणिका
| मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण | मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण |
|---|---|---|---|
| परमानन्दपूर्णोऽहम् | अव० १४ | पुनश्च जन्मान्तर कर्म | कैव० १४ |
| परम्ब्रह्मानुसंदध्यात् | ना०परि० ८.९ | पुनः स ....कथम् | जाबालि० ८ |
| परस्त्रीपुरपराङ्मुखः | याज्ञ० ७ | पुनः स ....कुतस्त्वया | जाबालि० ४ |
| परहंसाश्रमस्थो | ना०परि० ४.२४ | पुनः स .. तदुपासन ... | जाबालि० ९ |
| परामृतोऽस्म्यहम् | ब्र०वि० १०० | पुनः स ...तेनाथ | जाबालि० ६ |
| परिपूर्णपराकाशमग्रमनाः | मं०ब्रा० ३.२.१ | पुनः स ... तेनेशानादिति | जाबालि० ७ |
| परिपूर्णमनाद्यन्तम् | अध्या० ६१ | पुनः स ... भगवन् | जाबालि० १० |
| परिव्राजका अपि | आश्र० ४ | पुनः स ...विभूति | जाबालि० १७ |
| परिव्राज्यं गृहीत्वा | शाट्या० ३१ | पुनः स ...षडाननादिति | जाबालि० ५ |
| परेणैवात्मनश्चापि | ना०परि० ३.२ | पुनः स ...सद्योजात ... | जाबालि० १९ |
| पर्वताग्रे नदीतीरे | जा०द० ५.४ | पुनस्तज्ज्ञान ... | जा०द० ६.३८ |
| पवित्रं स्नानशाटीम्...अतोऽति | कुण्डि० १० | पुनस्तस्येतिपिङ्गलया | यो०त० ३८ |
| पवित्रं स्नानशाटीं ..वेदांश्च | कं०रु० ६ | पुरुष एवेदम् | सुबा० ६.७ |
| पश्यन्ति देहिवन्मूढाः | आत्म० १७ | पुरुषः परमात्माऽहम् | ब्र०वि०९९ |
| पांसुना च प्रतिच्छन्न | ना०परि० ५.४० | पुष्पवत्सकलम् | ब्र०वि० ३७ |
| पाणिपात्रश्चरन्योगी | ना०परि० ५.३६ | पूजितो वन्दितश्चैव | ना०परि० ३.१९ |
| पात्री दण्डी युग ... | शाट्या० २० | पूरककुम्भक ... | मं०ब्रा० १.१.६ |
| पादमेवाप्येति | सुबा० ९.८ | पूरकान्ते | शाण्डि० १.७.११ |
| पादसयोपरि | क्षुरि० १२ | पूरयेत्सर्वमात्मानम् | क्षुरि० ४ |
| पादाङ्गुष्ठगुल्फ ... | शाण्डि० १.८.२ | पूरयेदनिलम् | जा०द० ७.११ |
| पादादिजानुपर्यन्तम् | यो०त० ८५ | पूरितं धारयेत् | जा०द० ६.४ |
| पादावध्यात्मम् | सुबा० ५.१२ | पूर्वभागे | जा० द० ४.१८ |
| पायुमेवाप्येति | सुबा० ९.९ | पूर्वभागे ह्यधोलिङ्गम | ब्र०वि० ८० |
| पायुरध्यात्मम् | सुबा० ५.१३ | पूर्वं चोभयमुच्चार्य | ब्र०वि० ५६ |
| पारिव्राज्यं गृहीत्वा | शाट्या० ३१ | पूर्वं पूर्वम् | जा०द० ६.१५ |
| पार्थिवे वायुमारोप्य | यो०त० ८६ | पूर्वं यः कथितो | यो०त० ६७ |
| पाष्णिं वामस्य | यो०त० ११२ | पूर्ववद्विद्वत्संन्यासी | ना०परि० ४.३८ |
| पावनी परमोदारा | संन्या० २.६० | पूषाधिदेवता | जा०द० ४.३६ |
| पाशं छित्त्वा | क्षुरि० २२ | पूषा यशस्विनी | जा०द० ४.१५ |
| पाषाण लोहमणि | मैत्रे० २.२६ | पूषा वामाक्षिपर्यन्ता | जा०द० ४.२० |
| पिङ्गलायां | जाबा० ४.४० | पृथिवी वा अन्नम् | सुबा० १४.१ |
| पितामहं पुनः पप्रच्छ | ना०परि० ३.८० | पृष्ठमध्यस्थिते नाड्या | जा०द० ४.१० |
| पुण्यायतनचारी | ना०परि० ५.४५ | प्रकाशयन्तमन्तः स्थम् | पैङ्ग० ३.१० |
| पुत्रे मित्रे कलत्रे | जा०द० १.१६ | प्रगलितनिजमायोऽहम् | आ०बो० २.१ |
| पुनः पिङ्गलयापूर्वमात्रैः | जा०द० ६.७ | प्रज्ञया वाचम् | कौ०ब्रा० ३.६ |
| पुनः पिङ्गलयापूर्य वह्नि | जा०द० ५.९ | प्रज्ञातोऽहम् | ब्र०वि० १०१ |
| पुनःपुनः सर्वा ... | मं०ब्रा० २.३.७ | प्रणवेन | जा०द० ६.४१ |
| पुनर्जन्म निवृत्त्यर्थम् | प०ब्र० ७ | प्रतर्दनो ह वै | कौ०ब्रा० ३.१ |
| पुनर्यतिविशेषः | ना०परि०५.२१ | प्रतिगृह्य यतिश्चैतान् | संन्या० २.११५ |