१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ
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मन्त्रानुक्रमणिका ४९९
| मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण | मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण |
|---|---|---|---|
| योगो हि बहुधा | यो०त० १९ | वर्णं रक्तम् | पं०ब्र० १७ |
| योऽग्रौ रुद्रो | अथ० ६ | वर्णाश्रमं सावयवं | मैत्रे० १.१८ |
| योऽतीत्य स्वाश्रमान् | ना०परि० ६.१७ | वर्णाश्रमाचारयुता | मैत्रे० १.१७ |
| योनिं वामेन | शाण्डि० १.३.७ | वर्षाभ्योऽन्यत्र | संन्या० २.९९ |
| योऽन्तः शीतलया | संन्या० २.५६ | वह्निस्त्रिकोणम् | यो०त० ९५ |
| यो भवेत्पूर्वसंन्यासी | याज्ञ० १० | वाक्पाणिपाद... | शारी० ३ |
| योऽयमन्त्रमयः | कं०रु० २४ | वाक्यमप्रतिबद्धं | अध्या० ४० |
| यो विलङ्घ्याश्रामान्वर्णान् | अव० ३ | वाक्सिद्धिः कामरूपत्व | यो०त० ७४ |
| यो वै रुद्रः स भगवान् | अथ० २ | वागध्यात्मम् | सुबा० ५.१० |
| रथ्यायां बहुवस्त्राणि | संन्या० २.११८ | वागेवास्या | कौ०ब्रा० ३.५ |
| रसनाद्वायुमाकृष्य | शाण्डि० १.७.४५ | वाग्दण्डः कर्मदण्डश्च | ना०परि० ६.९ |
| रसना पीड्यमानेयम् | ब्र०वि० ७३ | वाग्दण्डे मौनम् | संन्या० २.११६ |
| रागं द्वेषं मदम् | ना०परि० ३.७० | वाचमेवाप्येति | सुबा० ९.६ |
| राग द्वेष वियुक्तात्मा | ना०परि० ३.३४ | वाचिकोपांशुरुच्चैश्च | जा०द० २.१४ |
| रागाद्यपेतम् | जा०द० २.८ | वातजाः पित्तजा | जा०द० ६.३० |
| रागाद्यसंभवे | जा०द० ६.५१ | वानप्रस्थगृहस्थाभ्यां | ना०परि० ५.४६ |
| राजवार्तादि | ना०परि० ३.५८ | वानप्रस्था अपि | आश्रमो० ३ |
| रिपौ बद्धे स्वदेहे | याज्ञ० २८ | वामदेवम् | पं०ब्र० १० |
| रुद्रग्रन्थिर्भ्रुवोर्मध्ये | ब्र०वि० ७१ | वामपादपाष्णिं | शाण्डि० १.७.४२-घ |
| रेचयेत्पिङ्गलानाड्या | यो०त०४२ | वामपादमूलेन | शाण्डि० १.७.४२-ग |
| लक्ष्यालक्ष्य विहीनो | मैत्रे० ३.१३ | वामाङ्गेन | यो०त० ११४ |
| लक्ष्येऽन्तर्बाह्यायां | मं०ब्रा० १.३.५ | वामांसदक्षकट्यन्तम् | प०ब्र० १५ |
| लब्धात्मा जिह्वया | संन्या० २.३३ | वायुना गतिमावृत्य | यो०त० ११६ |
| लभते योगयुक्तात्मा | यो०त० १४० | वायुनां सह चित्तम् | यो०त०८३ |
| लभ्यते यदि | यो०त० १२७ | वायुपरिचितो | यो०त०८२ |
| लययोगश्चित्तलयः | यो०त० २३ | वायुभक्षोऽम्बुभक्षो | कुण्डि० ४ |
| लवणं सर्षपम् | यो०त०४७ | वारिवत्स्फुरितं | यो०त० १० |
| लिङ्गदेहगता | आ०बो० २.२४ | वायुस्तेजस्तथा | ब्र०वि० १४ |
| लिङ्गे सत्यपि | ना०परि० ४.३२ | वारुणे वायुमारोप्य | यो०त० ८९ |
| लीनवृत्तेरनु० | अध्या० ४२ | वासनानुदयो भोग्ये | अध्या० ४१ |
| लोकत्रयेऽपि कर्तव्यम् | जा०द० १.२४ | विक्षेपो नास्ति | अव० २३ |
| लोकवद्धार्ययाऽऽसक्तो | कुण्डि० ७ | विचार्य सर्वधर्मेषु | हंस० २ |
| लोकानुवर्तनं त्यक्त्वा | अध्या० ३ | विचित्रा शक्तयः | संन्या० २.४२ |
| वक्रेण सीत्कार | शाण्डि० १.७.१३-३ | विजानाति तदा तस्य | कं०रु० ३३ |
| वज्र सूचीं प्रवक्ष्यामि | व०सू० १ | विज्ञात ब्रह्मतत्त्वस्य | अध्या० ४८ |
| वत्सराद्ब्रह्मविद्वान्स्यात् | जा०द० ६.११ | विज्ञानोऽस्मि | मैत्रे० ३.३ |
| वमनाहारवद्यस्य | मैत्रे० २.१८ | विज्ञेयोऽक्षर तन्मात्रो | पैङ्ग० ४.२३ |
| वर्जयित्वा | यो०त० ६२ | विदित्वा स्वात्मरूपेण | कं०रु० ३९ |
| वर्णत्रयात्मकाः | जा०द० ६.२ | विद्याभ्यासे प्रमादो | संन्या० २.१०३ |