१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ
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मन्त्रानुक्रमणिका ४२३
| मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण | मन्त्र प्रतीक | उपनिषद् विवरण |
|---|---|---|---|
| सर्वेषामेव पापानाम् | संन्या० २.११२ | स होवाच..स्तनयित्नौ | कौ०ब्रा० ४.५ |
| सर्वेषु कालेषु | प०प० ३-ग | स होवाच..स्थूल.. | पैङ्ग० २.२ |
| सर्वेषु देहेषु | हंस० ५ | स होवाचाकाशं | मं०ब्रा० ४.१.२ |
| सर्वोपाधिविनिर्मुक्तम् | कं०रु० ४६ | स होवाचाथर्वा अथेद्ं | शाण्डि० १.४.२ |
| सविषयं मनो बन्धाय | मं०ब्रा० ५.१.१ | स होवाचाथर्वा यस्माच्च | शाण्डि० ३.२.२ |
| सव्यदक्षिणनाडीस्थो | शाण्डि० १.७.४० | स होवाचाथर्वा | शाण्डि० २.२ |
| सव्येतरेण | जा०द० ६.३९ | स होवाचाथर्वा सत्यम् | शाण्डि० ३.१.२ |
| सव्ये दक्षिणगुल्फम् | शाण्डि० १.३.२ | सांकृति..नाडी | जा०द० ५.२ |
| सशरीरं समारोप्य | ना०परि० ८.८ | सांकृते..योगम् | जा०द० १.४ |
| सशिखं वपनम् | ब्रह्म० ६,प०ब्र० ६, | सा कालपुत्रपदवी | ना०परि० ३.४९ |
| ना०परि० ३.८१ | साक्ष्यनपेक्षोऽहम् | आ०बो० २.३ | |
| सशिखान्केशान् | कं०रु० २ | सात्त्विकराज ... | शारी० ७ |
| स संन्यासः षड्विधो | संन्या० २.२३ | सा त्याज्या | ना०परि० ३.५० |
| स साध्वसाधुकर्मभ्याम् | कं०रु० ४० | साध्यन्वज्रकुम्भानि | ब्र०वि० ७५ |
| सह तेनैव | कुण्डि० ५ | साधुभिः पूज्यमाने० | अध्या० ४७ |
| सहस्रभानुमच्छुरिता | म०वा० ७ | सान्निध्ये विषयाणां | ना०परि० ३.६८ |
| सहस्रमेकम् | ब्र०वि० ७९ | सा पुनर्विकृतिम् | पैङ्ग० १.४ |
| सहस्रारे जलज्योति .... | मं०ब्रा० १.४.१ | सामवेदस्तथा | ब्र०वि० ६ |
| स होवाच..अमानित्वादि | पैङ्ग० ४.२ | सा शक्तिर्येन | शाण्डि० १.७.३६-घ |
| स होवाच ..आकाशे | कौ०ब्रा० ४.६ | सा सत्यता सा शिवता | संन्या० २.६२ |
| स होवाच..आदर्शे | कौ०ब्रा० ४.१० | सा हि वाचामगम्य | संन्या० २.४४ |
| स होवाच..आदित्ये | कौ०ब्रा० ४.२ | सिंहासनं भवेत् | जा०द०३.६-३ |
| स होवाच एवैषोऽग्नौ | कौ०ब्रा० ४.८ | सिंहो वा योगिना | यो०त० ६० |
| स होवाच एवैषोऽप्सु | कौ०ब्रा० ४.९ | सिद्धमन्त्रम् | संन्या० २.८८ |
| स होवाच ... चन्द्रमसि | कौ०ब्रा० ४.३ | सुखदुःखैः समायुकम् | यो०त० ११ |
| स होवाच...छाया .. | कौ०ब्रा० ४.१३ | सुखम् ह्यवमतः | ना०परि० ३.४१ |
| स होवाच..तत्त्वमसि | पैङ्ग० ३.२ | सुखाद्यनुभवो | अध्या० ४९ |
| स होवाच..दक्षिणेऽक्षन् | कौ०ब्रा० ४.१६ | सुखासनवृत्ति ... | मं०ब्रा० १.१.५ |
| स होवाच नारायणः | मं०ब्रा० १.१.२ | सुखासनसमारूख्यं | जा०द० ३.२ |
| स होवाच प्राणोस्मि | कौ०ब्रा०३.२ | सुखासनस्थो | शाण्डि० १.७.१३-१ |
| स होवाच..प्राज्ञ .. | कौ०ब्रा० ४.१५ | सुखी भवति सर्वत्र | कं०रु० २८ |
| स होवाच..प्रति.. | कौ०ब्रा० ४.११ | सुजीर्णोऽपि | संन्या० २.१०९ |
| स होवाच ये वै | कौ०ब्रा० १.२ | सुलभश्चायमत्यन्तम् | संन्या० २.५० |
| स होवाच ..वायौ | कौ०ब्रा० ४.७ | सुषिरो ज्ञानजनकः | शाण्डि० १.७.३९ |
| स होवाच..विद्युति | कौ०ब्रा० ४.४ | सुषुप्तिसमाध्योः | मं० ब्रा० २.३.३ |
| स होवाच...शब्दः | कौ०ब्रा० ४.१२ | सुषुम्ना तु परे | क्षुरि० १६ . |
| स होवाच ...शारीरः | कौ०ब्रा० ४.१४ | सुषुम्ना पिङ्गला | जा०द० ४.७ |
| स होवाच ...सदेव | पैङ्ग० १.२ | सुषुम्नायाः शिवो | जा०द० ४.३५ |
| स होवाच..सव्येऽक्षन् | कौ०ब्रा० ४.१७ | सुषुम्नायाः सव्यभागे | शाण्डि० १.४.११ |