१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें॥कठरुद्रोपनिषद्॥ यह उपनिषद् कृष्णयजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत है। इसे 'कण्ठरुद्रोपनिषद्' भी कहा जाता है। इसमें देवताओं द्वारा ब्रह्मविद्या की जिज्ञासा किए जाने पर भगवान् प्रजापति ने संन्यास आश्रम में प्रवेश की विधि सहित आत्म तत्त्व का विवेचन किया है। प्रथम तीन कण्डिकाओं में संन्यास ग्रहण करने की विधि है। ४ से ११ तक संन्यासोपरांत निर्वाह किए जाने वाले विविध अनुशासनों का वर्णन है। उसके बाद ब्रह्म एवं माया का वर्णन करते हुए तन्मात्राओं एवं ब्रह्माण्ड रचना का उल्लेख है। पंचआत्मा-पंचकोशों का मर्म समझाते हुए परमात्म तत्त्व को ही ईश्वर, जीव, प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय एवं फल आदि के रूप में स्थापित किया गया है। अंत में इस सारे कथोपकथन को वेदान्त का सार कहा गया है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ सह नाववतु ................इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-अवधूतोपनिषद ) देवा ह वै भगवन्तमब्रुवन्नधीहि भगवन्ब्रह्मविद्याम्। स प्रजापतिरब्रवीत् ॥ १ ॥ एक बार समस्त देवगण भगवान् प्रजापति ब्रह्माजी के समीप जाकर बोले-हे भगवन्! आप कृपा करके हम लोगों को ब्रह्मविद्या का उपदेश करें; तब प्रजापति ने कहा- ॥ १ ॥ सशिखान्केशान्निष्कृष्य विसृज्य यज्ञोपवीतं निष्कृष्य ततः पुत्रं दृष्ट्वा त्वं ब्रह्मा त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारस्त्वमोंकारस्त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं धाता त्वं विधाता। अथ पुत्रो वदत्यहं ब्रह्माहं यज्ञोऽहं वषट्कारोऽहमोंकारोऽहं स्वाहाहं स्वधाहं धाताहं विधाताहं त्वष्टाहं प्रतिष्ठास्मीति। तान्येतान्यनुव्रजन्नाश्रुमापातयेत्। यदश्रुमापातयेत्प्रजां विच्छिन्द्यात्। प्रदक्षिणमावृत्त्यैतच्चैतान्या- नवेक्षमाणाः प्रत्यायन्ति। स स्वर्ग्यो भवति ॥ २ ॥ शिखा के साथ बालों का मुण्डन कराकर और यज्ञोपवीत का परित्याग करके, अपने पुत्र को देखकर उससे इस प्रकार कहे कि 'तुम ब्रह्मा हो, तुम यज्ञ हो, तुम वषट्कार हो, तुम ॐकार हो, तुम स्वाहा हो, तुम स्वधा हो, तुम धाता हो, तुम विधाता हो'। ऐसा सुनने के बाद पुत्र कहे कि 'मैं ब्रह्मा हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं वषट्कार हूँ, मैं ॐकार हूँ, मैं स्वाहा और स्वधा हूँ, मैं ही धाता, विधाता, त्वष्टा भी हूँ तथा प्रतिष्ठा भी मैं ही हूँ।' इस प्रकार से परिव्राजक (संन्यासी) होकर घर से बाहर निकलने पर जब पुत्र-पत्नी आदि पीछे-पीछे गमन करें, तो उन्हें देखकर के अश्रुपात न करे। यदि अश्रुपात करेगा, तो उसकी संतान विनष्ट हो जायेगी। तदनन्तर वे समस्त परिवारीजन संन्यासी की प्रदक्षिणा करने के पश्चात् उसे बिना देखे ही यदि वापस लौट जाते हैं, तो इस तरह का संन्यासी देवलोक का अधिकारी होता है॥ २ ॥ [पिता द्वारा पुत्र से दुहरवाये जाने वाले वाक्यों के पीछे उनका महत्त्वपूर्ण मन्तव्य है। सद्गृहस्थ जब संन्यासी बने, तो पुत्र को दायित्व सौंपने के साथ उसे आत्म गौरव का बोध करा दे; ताकि पिता का संरक्षण हट जाने पर भी वह आत्महीनता से ग्रस्त न हो, जाग्रत् आत्मविश्वास के साथ अपने दायित्वों का आदर्शनिष्ठ ढंग से निर्वाह कर सके। बिना अश्रुपात के विदाई के पीछे भी मोह मुक्त और आत्म विश्वास युक्त होकर होने का भाव है।]