१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५० कठरुद्रोपनिषद् वह सत्य-ज्ञान-आनन्द स्वरूप अद्वितीय ब्रह्म इस माया, अज्ञान एवं गुहा आदि नामों से कहे जाने वाले संसार में विद्यमान है। उस ब्रह्म को मात्र विद्या (सद्ज्ञान) के माध्यम से ही जाना जाता है। जो मनुष्य परम व्योम रूपी नित्य धाम में विद्यमान इस अविनाशी ब्रह्म को जानता है, वह (द्विजों में श्रेष्ठ) ब्राह्मण क्रमानुसार समस्त कामनाओं को प्राप्त कर लेता है। उसकी सभी इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं। अज्ञान एवं माया शक्ति के साक्षीरूप प्रत्यगात्मा को जो मनुष्य 'मैं एक ब्रह्मस्वरूप हूँ' इस प्रकार जानता है, वह (मनुष्य) स्वयं ही ब्रह्मस्वरूप हो जाता है॥ १४-१६॥ [ब्रह्मसाक्षात्कार कर लेने वाले साधक को यह गूढ़ तथ्य समझ में आने लगता है कि अव्यक्त आत्मतत्त्व से किस प्रकार व्यक्त सृष्टि प्रकट होती है। सृष्टि का यह क्रम आगे के मंत्रों में स्पष्ट किया गया है।] ब्रह्मभूतात्मनस्तस्मादेतस्माच्छक्तिमिश्रितात्। अपञ्चीकृत आकाशः संभूतो रज्जुसर्पवत्॥ १७॥ आकाशाद्वायुसंज्ञस्तु स्पर्शोऽपञ्चीकृतः पुनः। वायोरग्निस्तथा चाग्नेराप अद्भ्यो वसुन्धरा॥ १८॥ तानि सर्वाणि सूक्ष्माणि पञ्चीकृत्येश्वरस्तदा। तेभ्य एव विसृष्टं तद्ब्रह्माण्डादि शिवेन ह॥१९॥ ब्रह्माण्डस्योदरे देवा दानवा यक्षकिन्नराः। मनुष्याः पशुपक्ष्याद्यास्तत्तत्कर्मानुसारतः॥ २०॥ शक्ति सम्पन्न इस ब्रह्म रूप आत्मा से उसी प्रकार अपञ्चीकृत आकाश अर्थात् शब्द आदि तन्मात्राएँ उत्पन्न हुईं, जिस प्रकार रज्जु (रस्सी) में सर्प की प्रतीति होती है। इसके पश्चात् पुनः आकाश से वायु संज्ञक अपञ्चीकृत स्पर्श-तन्मात्राओं की उत्पत्ति हुई। तदनन्तर वायु से अग्नि की उत्पत्ति, अग्नि से जल की उत्पत्ति और जल से पृथिवी की उत्पत्ति हुई। उन सूक्ष्म भूतों को शिवस्वरूप ईश्वर ने पञ्चीकृत करके उन्हीं से ब्रह्माण्ड आदि की रचना की। ब्रह्माण्ड के उदर में समस्त भूत-प्राणियों के पूर्वकृत कर्मानुसार देव, दानव, यक्ष, किन्नर, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि योनियों की सृष्टि-रचना हुई॥ १७-२०॥ [रस्सी में साँप की प्रतीति तभी तक होती है, जब तक देखने वाले की दृष्टि यथार्थ तक नहीं पहुँच पाती। पदार्थ की रचना की प्राथमिक इकाई परमाणु है। सभी पदार्थों के परमाणु इलेक्ट्रॉन, प्रोट्रॉन, न्यूट्रॉन आदि के विविध संयोगों से ही बने हैं। उन उपकणों (सबएटामिक पॉर्टिकल्स) को देख सकने वाले के लिए सभी पदार्थों का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार मूल तत्त्व आत्म तत्त्व को देख पाने वाले के लिए यह संसार एक भ्रम जैसा ही रह जाता है।] अस्थिस्नाय्वादिरूपोऽयं शरीरं भाति देहिनाम्। योऽयमन्नमयो ह्यात्मा भाति सर्वशरीरिणः॥ २१॥ ततः प्राणमयो ह्यात्मा विभिन्नश्चान्तरस्थितः। ततो मनोमयो ह्यात्मा विभिन्नश्चान्तरस्थितः॥ २२॥ ततो विज्ञान आत्मा तु ततोऽन्यश्चान्तरः स्वतः। आनन्दमय आत्मा तु ततोऽन्यश्चान्तरस्थितः॥२३॥ योऽयमन्नमयः सोऽयं पूर्णः प्राणमयेन तु। मनोमयेन प्राणोऽपि तथा पूर्णः स्वभावतः॥ २४॥ तथा मनोमयो ह्यात्मा पूर्णो ज्ञानमयेन तु। आनन्देन सदा पूर्णः सदा ज्ञानमयः सुखम्॥ २५॥ तथानन्दमयश्चापि ब्रह्मणोऽन्येन साक्षिणा। सर्वान्तरेण पूर्णश्च ब्रह्म नान्येन केनचित्॥ २६॥ अस्थि, स्नायु आदि से निर्मित यह समस्त जीवों का शरीर भी अपने कर्मानुसार ही प्रकाशित हो रहा है। सभी शरीर धारण करने वालों का यह जो अन्नमय आत्मा स्थूल शरीर के माध्यम से प्रकाशित हो रहा है, उससे पृथक् एक प्राणमय आत्मा और है, जो कि इस अन्नमय आत्मा के अन्दर विद्यमान है। इससे भी सूक्ष्म और भिन्न मनोमय आत्मा है, जो प्राणमय के अन्दर स्थित है। इससे सूक्ष्म विज्ञानमय आत्मा है, जो मनोमय आत्मा के अन्दर विद्यमान है। इससे भी अतिसूक्ष्म आनन्दमय आत्मा है, जो विज्ञानमय आत्मा के अन्दर स्थित है। अन्नमय आत्मा प्राणमय से परिपूर्ण है, वैसे ही प्राणमय आत्मा स्वभावानुसार मनोमय आत्मा से पूर्ण है। मनोमय आत्मा विज्ञानमय से पूर्ण है तथा सदा सुखस्वरूप विज्ञानमय आत्मा आनन्दमय से परिपूर्ण रहता है। आनन्दमय