१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५६ कुण्डिकोपनिषद् सामान्य जीवन में पृथ्वी तत्त्व के संचरण से गंध उत्पन्न होती है। गंध की अनुभूति से जल-रस सक्रिय होकर स्वाद को उत्तेजना मिलती है। रस की उत्तेजना से अग्नि-जठराग्नि में तीव्रता आती है। अग्नि की तीव्रता से शरीरस्थ वायु-प्राण की संचरण प्रक्रिया तीव्र होती है। प्राण की गतिशीलता से विविध सांसारिक सुखोपभोगों की क्षमता का विकास होता है। योगस्थ स्थिति में तन्मात्राओं को रुद्ध करके बाह्य सुखानुभूति-परक उनकी सक्रियता को घटाकर अन्तः आनन्द की ओर उन्हें उन्मुख किया जाता है। ऐसी स्थिति शरीरस्थ वायु-प्राण के गतिशील होने पर अक्षर अनाहत नाद की अनुभूति होती है। यह नाद मूर्धास्थित सहस्रार एवं ब्रह्मरंध्र को सक्रिय करके परमगति का मार्ग खोलने में समर्थ होता है- स्वदेहस्य तु मूर्धानं ये प्राप्य परमां गतिम्। भूयस्ते न निवर्तन्ते परावरविदो जनाः ॥ २२॥ अपने इस शरीर में मूर्धा को प्राप्त कर लेना ही परमगति कहा गया है। जो मनुष्य इस गति को प्राप्त कर लेते हैं, वे ब्रह्मज्ञानी जन आवागमन के चक्र से मुक्त हो जाते हैं ॥ २२॥ न साक्षिणं साक्ष्यधर्माः संस्पृशन्ति विलक्षणम्। अविकारमुदासीनं गृहधर्माः प्रदीपवत् ॥ २३ ॥ विकाररहित और उदासीन भावयुक्त साक्षी को साक्ष्य-धर्म वैसे ही स्पर्श नहीं कर सकता, जिस प्रकार गृह-धर्म प्रज्वलित दीप पर कोई भी प्रभाव नहीं डाल सकता ॥ २३॥ [दीपक के प्रकाश में ही गृही (घर में रहने वाला) अपने विभिन्न धर्म कर्त्तव्यों को सम्पन्न करता है; लेकिन दीपक उन सबसे अप्रभावित रहता है, उसी प्रकार योगी की चेतना उसकी काया द्वारा विविध कर्म किये जाने की स्थिति तो पैदा करती है; लेकिन स्वयं उससे अप्रभावित रहती है।] जले वापि स्थले वापि लुठत्वेष जडात्मकः । नाहं विलिप्ये तद्धर्मैर्घटधर्मैर्नभो यथा ॥ २४॥ यह जड़ात्मक शरीर चाहे जल-राशि में पड़ा रहे अथवा स्थल अर्थात् जल से रहित भूमि पर पड़ा रहे, मैं (जीवात्मा) जो स्वयं चैतन्य रूप हूँ, इस कारण से उसमें लिप्त नहीं हो सकता। जैसे घड़े के कारण घटाकाश में किसी भी तरह की विकृति नहीं आने पाती ॥ २४॥ निष्क्रियोऽस्म्यविकारोऽस्मि निष्कलोऽस्मि निराकृतिः। निर्विकल्पोऽस्मि नित्योऽस्मि निरालम्बोऽस्मि निर्द्वयः ॥ २५ ॥ सर्वात्मकोऽहं सर्वोऽहं सर्वातीतोऽहमद्वयः । केवलाखण्डबोधोऽहं स्वानन्दोऽहं निरन्तरः ॥ २६ ॥ मैं तो निष्क्रिय,विकाररहित,निष्कलं,आकृतिरहित,निर्विकल्प,अनित्य,निरालम्ब,अद्वैत,सर्वात्मा, सर्वातीत एवं द्वयरहित हूँ। मैं केवल अखण्ड बोधस्वरूप हूँ तथा निरन्तर स्वयं आनन्दमय हूँ ॥२५-२६ स्वमेव सर्वतः पश्यन्मन्यमानः स्वमद्वयम्। स्वानन्दमनुभुञ्जानो निर्विकल्पो भवाम्यहम् ॥ मैं स्वयं को ही सतत देखता हूँ, स्वयं को ही अद्वैत रूप में मानता हुआ, स्वयं के आनन्द का उपभोग करता हुआ, मैं स्वयं ही निर्विकल्प रूप हूँ॥ २७ ॥ गच्छंस्तिष्ठन्नुपविशञ्छयानो वाऽन्यथापि वा। यथेच्छया वसेद्विद्वानात्मारामः सदा मुनिरित्युपनिषत् ॥ २८ ॥ सतत चला हुआ, रुका हुआ, बैठा हुआ, सोता हुआ या कुछ भी करता हुआ, वह विद्वान् मुनि रूप आत्मा अपने में ही संतुष्ट हुआ अपनी इच्छानुसार जीवनयापन करे,ऐसी ही यह उपनिषद् है ॥२८॥ ॐ आप्यायन्तु....................इति शान्तिः ॥ ॥ इति कुण्डिकोपनिषत्समाप्ता ॥