१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३ मन्त्र ६ ८१ निश्चय ही इस वाणी ने इस प्रज्ञा के एक अंग की क्षति-पूर्ति की है। बाहर की ओर उसके (वाणी के) विषय रूप से कल्पित ( भूतमात्रा अर्थात् पञ्चभूतों का अंश-विशेष ) नाम-शब्द है। घ्राणेन्द्रिय ने भी इस प्रज्ञा के एक अंग की पूर्ति की है। बाहर की तरफ उस घ्राणेन्द्रिय के विषयरूप से जो कल्पित भूतमात्रा है, वह गन्ध है। चक्षु ने भी इस प्रज्ञा के एक अंग की पूर्ति की है। बाहर की तरफ से उसके विषय रूप से कल्पित जो भूतमात्रा है, वही रूप है। ऐसे ही कर्णेन्द्रिय ने भी इस प्रज्ञा के एक अंग की क्षति-पूर्ति की है। बाहर की तरफ से उसके विषय रूप से कल्पित जो भूत मात्रा है, वही शब्द है। स्वादेन्द्रिय ने भी इस प्रज्ञा के एक अंग की पूर्ति की है। बाहर की तरफ से उसके विषय रूप से कल्पित जो भूत मात्रा है,वही अन्न का रस है। इसी प्रकार निश्चय ही हाथो ने भी प्रज्ञा के एक अंग की पूर्ति की है। बाहर की ओर से उनके विषय रूप से कल्पित जो भूत मात्रा है, वही कर्म है। ऐसे ही शरीर ने भी प्रज्ञा के एक अंग की पूर्ति की है। बाहर की ओर उसके विषय रूप से कल्पित जो भूत मात्रा है, वही सुख एवं दुःख है। इसी तरह निश्चय ही उपस्थ ने भी उस प्रज्ञा के एक अंग की पूर्ति की है, बाहर की तरफ उसके विषय रूप से कल्पित जो भूत मात्रा है, वही रति, आनन्द एवं प्रजा (सन्तान) की उत्पत्ति है। अवश्य ही पैरों ने भी इस प्रज्ञा के एक अंग की पूर्ति की है। बाहर की ओर उनके विषय रूप से कल्पित जो भूतमात्रा है, वहँ विचरण-क्रिया है। ऐसे ही प्रज्ञा के एक अंग की प्रज्ञा ने ही पूर्ति की है। उस (प्रज्ञा) से सम्बन्धित बाह्य विषय रूप से कल्पित जो भूतमात्रा है, वह बुद्धि के द्वारा अनुभूत वस्तुएँ एवं मनुष्योचित इच्छाएँ-कामनाएँ हैं॥ ५॥ प्रज्ञया वाचं समारुह्य वाचा सर्वाणि नामान्याप्नोति। प्रज्ञया प्राणं समारुह्य प्राणेन सर्वान्गन्धानाप्नोति प्रज्ञया चक्षुः समारुह्य चक्षुषा सर्वाणि रूपाण्याप्नोति प्रज्ञया श्रोत्रं समारुह्य श्रोत्रेण सर्वाञ्शब्दानाप्नोति प्रज्ञया जिह्वां समारुह्य जिह्वया सर्वानन्नरसानाप्नोति प्रज्ञया हस्तौ समारुह्य हस्ताभ्यां सर्वाणि कर्माण्त्याप्नोति प्रज्ञया शरीरं समारुह्य शरीरेण सुखदुःखे आप्नोति प्रज्ञयोपस्थं समारुह्योपस्थेनानन्दं रतिं प्रजातिमाप्नोति प्रज्ञया पादौ समारुह्य पादाभ्यां सर्वा इत्या आप्नोति प्रज्ञयैव धियं समारुह्य प्रज्ञयैव धियो विज्ञातव्यं कामानाप्नोति ॥ ६ ॥ प्रज्ञा के द्वारा वाणी पर आरूढ़ हो, अर्थात् वाणी की वश में करके मनुष्य वाक् शक्ति के द्वारा नामों को स्वीकार करता है। प्रज्ञा द्वारा ही प्राण (घ्राणेन्द्रिय) पर अधिकार करके सभी तरह की गन्धों को स्वीकार करता है। प्रज्ञा द्वारा ही नेत्रों को वश में रखकर समस्त रूपों को ग्रहण करता है। प्रज्ञा से ही मनुष्य श्रोत्रेन्द्रिय पर आरूढ़ होकर उसके द्वारा सभी तरह के शब्दों की स्वीकार करता है। प्रज्ञा द्वारा ही जिह्वा की वश में करके सम्पूर्ण अन्न के रसों को प्राप्त करता है। प्रज्ञा से ही हाथों को वश में करके हाथों द्वारा सभी प्रकार के कार्यों को पूर्ण करता है। प्रज्ञा द्वारा ही शरीर को वश में रखकर शरीर से भोग एवं पीड़ा जनित सुख-दुःखों को स्वीकार करता है। प्रज्ञा से ही उपस्थ को वश में रखकर उसके द्वारा रति, आनन्द एवं प्रजनन सामर्थ्य को प्राप्त करता है। प्रज्ञा द्वारा ही पैरों को वश में करके पैरों द्वारा सम्पूर्ण विचरण क्रियाओं को स्वीकार करता है एवं प्रज्ञा से ही बुद्धि को वश में करके उस (बुद्धि) के द्वारा अनुभूति जन्य वस्तुओं एवं कामनाओं की ग्रहण करता है ॥ ६ ॥ न हि प्रज्ञापेता वाङ् नाम किंचन प्रज्ञापयेत् । अन्यत्र मे मनोऽभूदित्याह । नाहमेतन्नाम प्राज्ञासिषमिति । न हि प्रज्ञापेतः प्राणो गन्धं कंचन प्रज्ञापयेदन्यत्र मे मनोऽभूदित्याह नाहमेतं गन्धं प्राज्ञासिषमिति । न हि प्रज्ञापेतं चक्षू रूपं किंचन प्रज्ञापयेदन्यत्र मे मनोऽभूदित्याह। नाहमेतद्रूपं प्राज्ञासिषमिति न प्रज्ञापेतं श्रोत्रं शब्दं कंचन प्रज्ञापयेदन्यत्र मे मनोऽभूदित्याह। नाहमेतं शब्दं