१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४ मन्त्र ७ ८५ स होवाच बालाकिर्य एवैष विद्युति पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदयिष्ठास्तेजस आत्मेति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते तेजस आत्मा भवति ॥ ४ ॥ तब वे विप्रश्रेष्ठ गार्ग्य मुनि कहने लगे-'हे राजन् ! विद्युत् मण्डल के अन्तर्गत जो यह अन्तर्यामी विराट् परब्रह्म है, मैं उसी का उपासक हूँ।' ऐसा सुनकर राजा अजातशत्रु तुरन्त बोले-'हे ब्रह्मन् ! आप इस सन्दर्भ में कुछ भी न कहें। मैं इस (विद्युत्) को प्रकाश की आत्मा मानकर उसको उपासना करता हूँ।' इस प्रकार जो भी मनुष्य विद्युत्-मण्डल में स्थित ब्रह्म की उपासना करता है, वह प्रकाश स्वरूप आत्मा ही हो जाता है ॥ ४ ॥ स होवाच बालाकिर्य एवैष स्तनयित्नौ पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदयिष्ठाः शब्दस्यात्मेति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते शब्दस्यात्मा भवति ॥ ५ ॥ तदुपरान्त बलाका-तनय गार्ग्य ने पुनः कहना प्रारम्भ किया- 'हे राजन् ! मेघमण्डल में गर्जना रूप में विद्यमान उस अन्तर्यामी अविनाशी परम ईश्वर की मैं साक्षात् परम ब्रह्म मानकर उपासना करता हूँ।' ऐसा सुनकर उन प्रख्यात नरेश अजातशत्रु ने उत्तर देते हुए कहा- हे ब्रह्मन् ! आप इस सन्दर्भ में कुछ भी न कहें। मैं इसे शब्द की आत्मा समझकर इस श्रेष्ठ तत्त्व की उपासना करता हूँ। इस भाँति से जो भी मनुष्य इस मेघमण्डल में विद्यमान परब्रह्म को शब्द की आत्मा मानकर उपासना करता है, वह मनुष्य स्वयं ही शब्द की आत्मा के रूप में परिणत हो जाता है ॥ ५ ॥ स होवाच बालाकिर्य एवैष आकाशे पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदयिष्ठाः पूर्णमप्रवर्ति ब्रह्मेति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते पूर्यते प्रजया पशुभिः । नो एव स्वयं नास्य प्रजा पुरा कालात्प्रवर्तते ॥ ६ ॥ तत्पश्चात् पुनः बलाका-नन्दन गार्ग्य ऋषि ने कहा-'हे राजन् ! आकाश मण्डल में प्रतिष्ठित परब्रह्म परमेश्वर की मैं अविनाशी ब्रह्म के रूप में उपासना करता हूँ।' इस पर राजा अजातशत्रु ने कहा-'हे ब्रह्मन् ! आपको इस सन्दर्भ में कुछ भी नहीं कहना चाहिए।' यह तो पूर्ण, प्रवृत्ति रहित (क्रिया रहित) एवं ब्रह्म अर्थात् सभी से विशाल है। अवश्य ही इसी रूप में मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी तरह जो भी मनुष्य इस प्रसिद्ध आकाश मण्डल के अन्तर्गत स्थित पुरुष की इस रूप में उपासना करता है, वह प्रजा एवं पशुओं से युक्त हो जाता है। इसके अतिरिक्त, न तो स्वयं वह और न उसकी संतान ही समय से पूर्व मृत्यु को प्राप्त होते हैं ॥ ६ ॥ स होवाच बालाकिर्य एवैष वायौ पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदयिष्ठा इन्द्रो वैकुण्ठोऽपराजिता सेनेति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते । जिष्णुर्ह वापराजयिष्णुरन्यतस्त्यजायी भवति ॥ ७ ॥ वे प्रसिद्ध बलाका-पुत्र गार्ग्य पुनः कहने लगे-'हे राजन् ! यह जो वायुमण्डल में स्थित विराट् पुरुष है, मैं (गार्ग्य) अविनाशी ब्रह्म के रूप में इसकी उपासना करता हूँ।' गार्ग्य से ऐसा सुनने पर उन प्रसिद्ध नरेश अजातशत्रु ने कहा- 'हे ब्रह्मन् ! आपको इस विषय में कुछ भी नहीं कहना चाहिए; यह इन्द्र अर्थात् श्रेष्ठ ऐश्वर्य से युक्त, वैकुण्ठ अर्थात् कहीं भी कुण्ठाग्रस्त न रहने वाला तथा कहीं भी न हारने वाली सेना है। अवश्य ही मैं इसकी इसी भावना से उपासना करता हूँ; इसी तरह से जो भी मनुष्य इस वायु मण्डल के मध्य में स्थित