भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 414 में से

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पृष्ठ 87

अध्याय ४ मन्त्र १९ ८९ बनाने के लिए अपने पास बुलाये। अतः आप आयें (एकान्त स्थान की ओर चलें), वहाँ आपको निश्चय ही मैं स्वयं विराट् ब्रह्म का बोध कराऊँगा।' ऐसा कहकर राजा (अजातशत्रु) बलाका-तनय गार्ग्य का हाथ पकड़ करके वहाँ से चल दिये। वे दोनों (राजा एवं गार्ग्य) एक सोये हुए व्यक्ति के पास आये। वहाँ पर राजा अजातशत्रु ने उस सोये हुए व्यक्ति को जगाने का प्रयास करते हुए बुलाया-'हे ब्रह्मन् ! हे पाण्डरवास ! हे सोम राजन् ! इस तरह से सम्बोधन करने पर भी जब वह व्यक्ति सोया ही रहा, तब उस व्यक्ति के शरीर में छड़ी से प्रहार किया। जैसे ही उसके शरीर में प्रहार किया गया, वह सोया हुआ व्यक्ति उस छड़ी की चोट से उठकर खड़ा हो गया। ऐसा दृश्य देखकर बलाका-पुत्र गार्ग्य से राजा अजातशत्रु ने कहा-'हे बलाके! यह व्यक्ति इस तरह अचेत सा रहकर कहाँ शयन करता था ? किस प्रदेश में इसका शयन हुआ था ? तथा इस जाग्रत्-अवस्था में यह कहाँ से आ गया है?' ॥ १८ ॥ तं होवाचाजातशत्रुर्यत्रैष एतद्बालाके पुरुषोऽशयिष्ट यत्रैतदभूद्यत एतदागादिति । हिता नाम हृदयस्य नाड्यो हृदयात्पुरीततमभिप्रतन्वन्ति तद्यथा सहस्रधा केशो विपाटितस्तावदण्व्यः पिङ्गलस्याणिम्ना तिष्ठन्ति। शुक्लस्य कृष्णस्य पीतस्य लोहितस्येति तासु तदा भवति। यदा सुप्तः स्वप्नं न कंचन पश्यत्यस्मिन्प्राण एवैकधा भवति तदैनं वाक्सवैर्नामभिः सहाप्येति चक्षुः सर्वै रूपैः सहाप्येति श्रोत्रं सर्वैः शब्दैः सहाप्येति मनः सर्वैर्ध्यानैः सहाप्येति स यदा प्रतिबुध्यते यथाऽग्नेर्ज्वलतः सर्वा दिशो विस्फुलिङ्गा विप्रतिष्ठेरन्नैवमेवैतस्मादात्मनः प्राणा यथायतनं विप्रतिष्ठन्ते प्राणेभ्यो देवा देवेभ्यो लोकाः तद्यथा क्षुरः क्षुरधानेऽवहितः स्यात्। विश्वंभरो वा विश्वंभरकुलाय एवमेवैष प्रज्ञ आत्मेदं शरीरमात्मानमनुप्रविष्ट आलोमभ्य आनखेभ्यः ॥ १९ ॥ गार्ग्य इस रहस्य को न समझ पाये, तब पुनः उनसे राजा अजातशत्रु ने कहा-'हे बलाका-तनय ! यह पुरुष इस तरह से अचेत-सा होकर जहाँ सोता था, जहाँ शयन करता था और इस जाग्रत्-अवस्था में इसका जहाँ से आगमन हुआ है, वह स्थान इस प्रकार से जाना जाता है। 'हिता' नाम से प्रसिद्ध बहुत-सी नाड़ियाँ हैं, जो कि हृदय-कमल से सम्बन्ध रखने वाली हैं। वे (नाड़ियाँ) हृदय-कमल से निकलकर सम्पूर्ण शरीर में विस्तृत होकर फैली हुई हैं। इन नाड़ियों का परिमाण इस तरह से है-एक बाल के हजारवें भाग के बराबर ही सूक्ष्मातिसूक्ष्म वे सभी नाड़ियाँ हैं। पिङ्गल अर्थात् विभिन्न तरह के रंगों का जो अति सूक्ष्मतम रस है, इससे वे पूर्ण हैं। शुक्ल, कृष्ण, पीत एवं रक्त आदि इन सभी रंगों के सूक्ष्मातिसूक्ष्म अंशों से वे सम्पन्न हैं। उन्हीं समस्त नाड़ियों में यह पुरुष सुषुप्तावस्था के समय विद्यमान रहता है। जिस समय यह सोया हुआ पुरुष किसी भी तरह का स्वप्न नहीं देखता, तब उस समय यह इस मुख्य प्राण तत्त्व में ही एकात्मभाव को प्राप्त कर लेता है। उस समय वाणी अपने समस्त नामों सहित इस प्राणतत्त्व में विलीन हो जाती है। चक्षु भी अपने सभी रूपों के साथ इस प्राण में ही मिल जाता है। कर्णेन्द्रिय अपने सभी शब्दों के साथ इस प्राण में विलीन हो जाती है और मन भी सभी चिन्तनयुक्त विषयों के सहित इस प्राण-तत्त्व में विलीन हो जाता है। यह पुरुष जब जाग जाता है, तब उस समय जैसे जलती हुई अग्नि से सभी दिशाओं की तरफ चिनगारियाँ प्रस्फुटित होती हैं, वैसे ही इस प्राण स्वरूप आत्मा से सभी वाणी आदि प्राणतत्त्व बहिर्गमन कर अपने-अपने भोग्य-स्थल की तरफ गमन कर जाते हैं। तत्पश्चात् प्राणों से उनके अधिष्ठाता अग्नि आदि देवों का प्रादुर्भाव होता है एवं साथ ही देवताओं से लोक अर्थात् नाम आदि विषयों का प्राकट्य होता है। उस

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