भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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१०० जाबालदर्शनोपनिषद् सीवनी की सूक्ष्म रेखा को बायें टखने से दबाकर, दायें टखने से बायें को दबाने पर मुक्तासन होता है ॥ मेढ्रादुपरि निक्षिप्य सव्यं गुल्फं तथोपरि। गुल्फान्तरं च संक्षिप्य मुक्तासनमिदं मुने ॥ ९ ॥ हे मुने ! मेढ़्र (जननेन्द्रिय) के ऊपर बायें टखने को रखे तथा उसके ऊपर दायाँ टखना रखे, यह स्थिति भी मुक्तासन कहलाती है ॥ ९ ॥ कूर्पराग्रे मुनिश्रेष्ठ निक्षिपेन्नाभिपाश्र्वयोः । भूम्यां पाणितलद्वन्द्वं निक्षिप्यैकाग्रमानसः ॥ १० ॥ समुन्नतशिरःपादो दण्डवद्व्योम्नि संस्थितः । मयूरासनमेतत्स्यात्सर्वपापप्रणाशनम् ॥ ११ ॥ हे मुनि श्रेष्ठ ! अपनी दोनों हथेलियों को भूमि पर रखकर कुहनियों के अग्रभाग को नाभि के दोनों पाश्र्वों में लगाये। तत्पश्चात् सिर एवं पैरों को ऊँचा करके आकाश में दण्ड के सदृश स्थित हो जाये। यह मयूर आसन है, जो सभी तरह के पापों को विनष्ट करने वाला है ॥ १०-११ ॥ येन केन प्रकारेण सुखं धैर्यं च जायते । तत्सुखासनमित्युक्तमशक्तस्तत्समा Obligatory line: येन केन प्रकारेण सुखं धैर्यं च जायते। तत्सुखासनमित्युक्तमशक्तस्तत्समा Obligatory line: येन केन प्रकारेण सुखं धैर्यं च जायते। तत्सुखासनमित्युक्तमशक्तस्तत्समा Obligatory line: येन केन प्रकारेण सुखं धैर्यं च जायते। तत्सुखासनमित्युक्तमशक्तस्तत्समा Obligatory line: येन केन प्रकारेण सुखं धैर्यं च जायते। तत्सुखासनमित्युक्तमशक्तस्तत्समाश्रयेत् ॥ १२ ॥ जिस किसी भी तरह से बैठने में सुख एवं धैर्य बना रहे, वह आसन ही सुखासन है। अशक्त साधकों को इसी सुखासन का ही आश्रय लेना चाहिए ॥ १२ ॥ आसनं विजितं येन जितं तेन जगत्त्रयम्। अनेन विधिना युक्तः प्राणायामं सदा कुरु ॥ १३ ॥ जिसने इन आसनों को जीत लिया, उसने सम्पूर्ण त्रिलोकी को अपने वश में कर लिया। अतः हे सांकृते ! इसी विधि से (योग) युक्त होकर तुम सदा ही प्राणायाम किया करो ॥ १३ ॥

॥ चतुर्थः खण्डः ॥ इस खण्ड में नाड़ी-परिचय, आत्मतीर्थ तथा आत्मज्ञान की महिमा का वर्णन है- शरीरं तावदेव स्यात्षण्णवत्यङ्गुलात्मकम्। देहमध्ये शिखिस्थानं तप्तजाम्बूनदप्रभम् ॥ १ ॥ त्रिकोणं मनुजानां तु सत्यमुक्तं हि सांकृते । गुदात्तु द्व्यङ्गुलादूर्ध्वं मेढ्रात्तु द्व्यङ्गुलादधः ॥ २ ॥ देहमध्यं मुनिप्रोक्तमनुजानीहि सांकृते । कन्दस्थानं मुनिश्रेष्ठ मूलाधारान्नवाङ्गुलम् ॥ ३॥ हे सांकृते ! यह मानव शरीर अपने हाथ की माप से ९६ अंगुल का होता है। इस शरीर के मध्य भाग में अग्नि का स्थान निहित है। उसका वर्ण तपाये हुए स्वर्ण के सदृश कहा गया है। उसकी त्रिकोण आकृति है। यह हमने यथार्थ बात ही तुमसे बतायी है। गुदा भाग से दो अंगुल ऊर्ध्व की ओर तथा लिङ्ग से दो अंगुल नीचे की ओर जो स्थान है, उसे ही मनुष्य-देह का मध्य भाग समझना चाहिए। वही मूलाधार है, पर हे मुनिश्रेष्ठ ! इस स्थान से नौ अंगुल ऊर्ध्व में कन्द स्थान है ॥ १-३ ॥ चतुरङ्गुलमायामविस्तारं मुनिपुङ्गव । कुक्कुटाण्डसमाकारं भूषितं तु त्वचादिभिः ॥ ४ ॥ उस कन्द की लम्बाई-चौड़ाई चार-चार अंगुल की है तथा उसकी आकृति मुर्गी के अण्डे की भाँति है। वह ऊपर से चमड़े आदि के द्वारा सुसज्जित है ॥ ४ ॥ तन्मध्ये नाभिरित्युक्तं योगज्ञैर्मुनिपुङ्गव । कन्दमध्यस्थिता नाडी सुषुम्नेति प्रकीर्तिता ॥ ५ ॥ हे मुनि पुङ्गव ! उस कन्द स्थान के मध्य भाग में नाभि केन्द्र है, ऐसा योग विज्ञानियों ने कहा है। कन्द के बीच में जो नाड़ी स्थित है, उसका सुषुम्ना के नाम से उल्लेख किया गया है ॥ ५॥ तिष्ठन्ति परितस्तस्या नाड्यो हि मुनिपुङ्गव । द्विसप्ततिसहस्त्राणि तासां मुख्याश्चतुर्दश ॥ ६ ॥