भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 505 में से

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१०२ छान्दोग्योपनिषद्

कल्पन्ते हास्मा ऋतव ऋतुमान्भवति य एतदेवं विद्वानृतुषु पञ्चविधꣳसामोपास्ते ॥ २ ॥ इस प्रकार जानने वाला जो पुरुष पञ्चविध साम की उपासना करता है, उसे ऋतुएँ अभीष्ट भोग प्रदान करती हैं तथा वह ऋतु के अनुसार सर्वदा भोगों से सम्पन्न रहता है ॥ २ ॥ ॥ षष्ठः खण्डः ॥ पशुषु पञ्चविधꣳसामोपासीताजा हिंकारोऽवयः प्रस्तावो गाव उद्गीथोऽश्वाः प्रतिहारः पुरुषो निधनम् ॥ १ ॥ पशुओं में पंचविध साम की उपासना करनी चाहिए। बकरे हिंकार हैं, भेड़ें प्रस्ताव हैं, गौएँ उद्गीथ हैं, अश्व प्रतिहार हैं और पुरुष निधन हैं ॥ १ ॥ भवन्ति हास्य पशवः पशुमान्भवति य एतदेवं विद्वान्पशुषु पञ्चविधꣳ सामोपास्ते ॥ २ ॥ इस प्रकार जानने वाला जो पुरुष पशुओं में पञ्चविध साम की उपासना करता है, उसे पशु सम्पदा प्राप्त होती है और वह पशुओं द्वारा प्रदत्त भोगों से सम्पन्न होता है ॥ २ ॥ ॥ सप्तमः खण्डः ॥ प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपासीत प्राणो हिंकारो वाक्प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारो मनो निधनं परोवरीयाꣳसि वैतानि ॥ १ ॥ प्राणों (इन्द्रियों) में श्रेष्ठता के क्रम से साम की पंचविध उपासना करनी चाहिए। यह प्राण हिंकार है, वाणी प्रस्ताव है, चक्षु उद्गीथ है, श्रोत्र प्रतिहार है और मन निधन है। ये उपासनाएँ क्रमशः श्रेष्ठतर हैं ॥ १ ॥ परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकाञ्जयति य एतदेवं विद्वान्प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपास्त इति तु पञ्चविधस्य ॥ २ ॥ इस प्रकार जानने वाला जो पुरुष प्राणों में पञ्चविध साम की उपासना करता है, वह श्रेष्ठतर जीवन को प्राप्त होता है तथा श्रेष्ठतर लोकों को प्राप्त करता है। यह पञ्चविध साम उपासना का स्वरूप है ॥ २ ॥ ॥ अष्टमः खण्डः ॥ सामान्य क्रम में साम के पाँच विभाग किये जाते हैं। जब साधक की साधना परिपक्व हो जाती है, तो उसके सूक्ष्म विभाग बनाकर संख्या सात कर दी जाती है। अष्टम से दशम खण्ड तक सप्तविध साम की उपासना का मर्म प्रकट किया गया है- अथ सप्तविधस्य वाचि सप्तविधꣳ सामोपासीत यत्किंच वाचो हुमिति स हिंकारो यत्प्रेति स प्रस्तावो यदेति स आदिः ॥ १ ॥ अब सप्तविध साम की उपासना का वर्णन किया जाता है। वाणी में सप्तविध साम की उपासना करनी चाहिए। शब्द 'हुं' हिंकार रूप है। शब्द 'प्र' प्रस्ताव रूप है और शब्द 'आ' ही आदि रूप है ॥ १ ॥ यदुदिति स उद्गीथो यत्प्रतीति स प्रतिहारो यदुपैति स उपद्रवो यन्नीति तन्निधनम् ॥ २ ॥ शब्द 'उत्' ही उद्गीथ रूप है, 'प्रति' ही प्रतिहार है। शब्द 'उप' उपद्रव रूप है और 'नि' निधन रूप है ॥ २ ॥ दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतदेवं विद्वान्वाचि सप्तविधꣳ सामोपास्ते ॥ ३ ॥

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