१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२८ छान्दोग्योपनिषद् स ह क्षत्तान्विष्य नाविदमिति प्रत्येयाय तँ होवाच यत्रारे ब्राह्मणस्यान्वेषणा तदेनमच्छेति ॥ ७ ॥ वे सेवक रैक्व को ढूँढ़ने के पश्चात् वापस लौटकर कहते हैं- 'उसे नहीं पा सके'। तब राजा ने कहा- जहाँ ब्राह्मण की खोज की जाती है, वहाँ उन्हें ढूँढ़ो ॥ ७ ॥ सोऽधस्ताच्छकटस्य पामानं कषमाणमुपोपविवेश तँ हाभ्युवाद त्वं नु भगवः सयुग्वा रैक्व इत्यहँ ह्या ३ इति ह प्रतिजज्ञे स ह क्षत्ताऽविदमिति प्रत्येयाय ॥ ८ ॥ उन्होंने एक शकट के नीचे खाज खुजाते हुए रैक्व को देखकर उनसे पूछा- भगवन्! क्या आप ही गाड़ी वाले रैक्व हैं ? उनने कहा हाँ मैं ही हूँ। ऐसा जानकर सेवक राजा के पास चले आये ॥ ८ ॥ ॥ द्वितीयः खण्डः ॥ तदुह जानश्रुतिः पौत्रायणः षट् शतानि गवां निष्कमश्वतरीरथं तदादाय प्रतिचक्रमे तँ हाभ्युवाद ॥ १ ॥ तब राजा जनश्रुत के प्रपौत्र छः सौ गौएँ, एक हार और खच्चरों से खींचा जाने वाला एक रथ लेकर रैक्व के पास गये और बोले ॥ १ ॥ रैक्वेमानि षट् शतानि गवामयं निष्कोऽयमश्वतरीरथो नु म एतां भगवो देवताँ शाधि यां देवतामुपास्स इति ॥ २ ॥ हे रैक्व! ये छः सौ गौएँ, एक हार और खच्चरों से जुतां एक रथ आपके निमित्त लाया हूँ, इसे ग्रहण करें। हे भगवन्! आप जिस देवता की उपासना करते हैं, उसका मुझे उपदेश करें। ऐसा राजा ने रैक्व से कहा ॥ २ ॥ तमु ह परः प्रत्युवाचाह हारेत्वा शूद्र तवैव सह गोभिरस्त्विति तदुह पुनरेव जानश्रुतिः पौत्रायणः सहस्रं गवां निष्कमश्वतरीरथं दुहितरं तदादाय प्रतिचक्रमे ॥ ३ ॥ उस राजा से रैक्व ने कहा- हे क्षुद्र ! गौएँ, हार और रथ अपने पास रखो। तब जनश्रुत के प्रपौत्र एक सहस्र गौएँ, एक हार, खच्चरों से जुता रथ और अपनी कन्या लेकर उनके पास आये ॥ ३ ॥ तँ हाभ्युवाद रैक्वेदं सहस्रं गवामयं निष्कोऽयमश्वतरीरथ इयं जायाऽयं ग्रामो यस्मिन्नास्सेऽन्वेव मा भगवः शाधीति ॥ ४ ॥ राजा ने रैक्व से कहा- हे रैक्व ! ये एक हजार गौएँ, यह हार, खच्चरों से जुता रथ, यह पत्नी और यह गाँव (जिसमें आप रहते हैं) आप ले लें। हे भगवन् ! मुझे ईश्वरीय अनुशासन बतायें ॥ ४ ॥ तस्या ह मुखमुपोद्गृह्णन्नुवाचाजहारेमाः शूद्रानेनैव मुखेनालापयिष्यथा इति ते हैते रैक्व पर्णा नाम महावृषेषु यत्रास्मा उवास तस्मै होवाच ॥ ५ ॥ तब रैक्व ने उस राजकन्या को विद्या ग्रहण का द्वार समझकर राजा से कहा- 'हे क्षुद्र ! आप ये जो कुछ लाए हैं, ये सब गौण हैं; परन्तु विद्या ग्रहण के इस द्वार से आप (प्रसन्न करके) मुझसे उपदेश कराते हैं'। इस प्रकार जितने क्षेत्र में वे 'रैक्व' रहते थे, वे सभी गाँव महावृष देश में 'रैक्वपर्ण' के नाम से प्रसिद्ध हुए। (इससे प्रसन्न होकर) उन (रैक्व) ने उस राजा से कहा- ॥ ५ ॥