भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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१५६ छान्दोग्योपनिषद् इस सन्दर्भ में यह उल्लेख भी है कि जिस तरह सींक का अग्रभाग अग्नि में प्रवेश करा देने से अतिशीघ्र जल जाता है, ठीक उसी तरह से जो यजमान इस भाँति जानने में समर्थ होकर यज्ञ कृत्य सम्पन्न करता है, उसके सभी प्रकार के पाप जलकर नष्ट हो जाते हैं ॥ ३ ॥ तस्मादु हैवंविद्यद्यपि चण्डालायोच्छिष्टं प्रयच्छेदात्मनि हैवास्य तद्वैश्वानरे हुतꣳस्यादिति तदेष श्लोकः ॥ ४ ॥ इस विद्या का जानकार यदि भोजन से उच्छिष्ट (बचा हुआ) पदार्थ चाण्डाल को दे, तो वह कृत्य आत्मा रूप वैश्वानर में यज्ञ करने के समान है। प्रस्तुत विषय में यह मन्त्र कहा गया है॥ ४ ॥ यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासते। एवꣳसर्वाणि भूतान्यग्निहोत्रमुपासत इत्यग्निहोत्रमुपासत इति ॥ ५ ॥ जिस भाँति इस संसार में क्षुधित बालक सब प्रकार से माँ की उपासना (प्रतीक्षा) करते हैं। ठीक उसी भाँति संसार के समस्त प्राणि-समुदाय इस ज्ञानी के हव्य रूप यजन कृत्य की उपासना करते हैं ॥ ५ ॥ ॥ अथ षष्ठोऽध्यायः ॥ ॥ प्रथमः खण्डः ॥ पाँचवें अध्याय में यह बताया गया है कि अग्निहोत्र के यथार्थ स्वरूप की जानकारी रखने वाले एक विशेषज्ञ के कार्य से सभी प्राणि-समुदाय तृप्त हो जाते हैं; किन्तु ऐसी सम्भावना तभी की जा सकती है, जब समस्त प्राणियों में एक ही आत्मा का आधिपत्य स्थापित हो। प्रस्तुत विषय का विस्तार से इस छठे अध्याय में उल्लेख किया गया है- श्वेतकेतुर्हारुणेय आस तꣳ ह पितोवाच श्वेतकेतो वस ब्रह्मचर्यम्। न वै सोम्यास्मत्कुलीनोऽननूच्य ब्रह्मबन्धुरिव भवतीति ॥ १ ॥ अरुण के पौत्र श्वेतकेतु को उसके पिता (उद्दालक) ने ब्रह्मचर्य के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए उसे ब्रह्मचर्य आश्रम में प्रवेश की अनुमति प्रदान की। उसके पिता ने उसे संबोधित करते हुए कहा कि हमारे वंश में जन्म लेने वाला कोई भी बालक ब्रह्म विद्या के अध्ययन के बिना ब्रह्मबन्धु की भाँति नहीं होता ॥ [ ब्रह्म बन्धु उसे कहते हैं, जो ब्राह्मणों जैसा आचरण नहीं कर पाता; किन्तु उनसे सम्बद्ध होता है। ऋषि के कथन का भाव है कि उनके कुल में सभी आचरण निष्ठा ब्रह्मज्ञ होते हैं। ] स ह द्वादशवर्ष उपेत्य चतुर्विंशतिवर्षः सर्वान्वेदानधीत्य महामना अनूचानमानी स्तब्ध एयाय तꣳ ह पितोवाच श्वेतकेतो यन्नु सोम्येदं महामना अनूचानमानी स्तब्धोऽस्युत तमादेशमप्राक्ष्यः ॥ इस प्रकार से उसके पिता द्वारा उपदेश दिये जाने पर श्वेतकेतु ने मात्र १२ वर्ष की उम्र में ही अपने आचार्य के सान्निध्य में उपस्थित रहकर २४ वर्ष की उम्र तक वेदों का अध्ययन-अनुशीलन किया। तत्पश्चात् वह स्वयं को बड़ा अध्ययनरत एवं विद्वान् अनुभव करते हुए स्वाभिमान के साथ पिता के सामने उपस्थित हुआ। पिता ने विपरीत स्वभाव वाले उद्दण्ड श्वेतकेतु से कहा- “क्या तुमने अपने आचार्य से परब्रह्म का उपदेश (ज्ञान) प्राप्त कर लिया है।" ॥ २ ॥ येनाश्रुतꣳ श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति। कथं नु भगवः स आदेशो भवतीति ॥ ३ ॥