१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६ [भूमिका] (१८९) श्रीचक्रोपनिषद् (२०५) सिद्धान्तविन्दूपनिषद् (१९०) श्रीविद्यातारकोपनिषद् (२०६) सिद्धान्तशिखोपनिषद् (१९१) श्री सूक्तम् (२०७) सिद्धान्तसारोपनिषद् (१९२) श्वेताश्वतरोपनिषद् (२०८) सीतोपनिषद् (१९३) षोढोपनिषद् (२०९) सुदर्शनोपनिषद् (१९४) सङ्कर्षणोपनिषद् (२१०) सुबालोपनिषद् (१९५) सदानन्दोपनिषद् (२११) सुमुख्युपनिषद् (१९६) सन्ध्योपनिषद् (२१२) सूर्यतापिन्युपनिषद् (१९७) संन्यासोपनिषद् (अध्यायात्मक) (२१३) सूर्योपनिषद् (१९८) संन्यासोपनिषद् (वाक्यात्मक) (२१४) सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषद् (१९९) सरस्वतीलहस्योपनिषद् (२१५) स्कन्दोपनिषद् (२००) सर्वसारोपनिषद् (सर्वोपनिषद्) (२१६) स्वसंवेद्योपनिषद् (२०१) सहवै उपनिषद् (२१७) हयग्रीवोपनिषद् (२०२) संहितोपनिषद् (२१८) हंसषोडोपनिषद् (२०३) सामरहस्योपनिषद् (२१९) हंसोपनिषद् (२०४) सावित्र्युपनिषद् (२२०) हेरम्बोपनिषद् भाष्य एवं अनुवाद आचार्य शंकर ने ईश, केन, कठ, प्रश्न, जी० ए० नटसेन, मद्रास, सीतानाथ तत्त्वभूषण मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, (१९००), एस० सी० बसु (१९११), आर० हूम बृहदारण्यक एवं श्वेताश्वतर, इन ११ उपनिषदों के (१९२१), ई० बी० कोवेल, हिरियन्ना, द्विवेदी, भाष्य किये हैं। इसके पूर्व उपनिषदों के स्वतन्त्र गदाधर शास्त्री और श्री अरविन्द ने भी कुछ उपनि- भाष्य गिने-चुने ही किये गये हैं। षदों के अनुवाद प्रकाशित किये हैं। शाहजादा दाराशिकोह द्वारा किए गये मुख्य उपनिषदों पर शंकर के भाष्यों के फारसी अनुवाद संग्रह में लगभग ५० उपनिषदें अँग्रेजी अनुवाद भी उपलब्ध हैं। उनकी व्याख्याओं शामिल थीं। कोलब्रुक के संग्रह में उपनिषदों में अद्वैत का दृष्टिकोण है। रंगरामानुज ने उपनिषदों की संख्या ५२ थी। जर्मन विद्वान् मैक्समूलर ने के अपने भाष्यों में रामानुज का दृष्टिकोण अपनाया आचार्य शंकर द्वारा चुनी गयी ११ उपनिषदों के है। मध्व के भाष्यों में द्वैत दृष्टिकोण है। उनके साथ 'मैत्रायणीय' उपनिषद् सहित १२ उपनिषदों भाष्यों के उद्धरण पाणिनी आफिस इलाहाबाद से का अनुवाद किया था। प्रकाशित उपनिषदों के संस्करण में मिलते हैं। उपनिषदों के अँग्रेजी अनुवाद इस क्रम से उक्त उपनिषदों के अतिरिक्त अन्य उपनिषदों प्रकाशित हुए हैं- राजाराममोहनराय (१८३२), के भाष्य या भावार्थ छिट-पुट रूप से कहीं-कहीं रोअर (१८५३), मैक्समूलर (१८७९-१८८४- मिलते हैं। गीताप्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित सेक्रेट बुक्स ऑफ द ईस्ट), मीड और चट्टोपाध्याय 'कल्याण' के विशेषांक 'उपनिषद् अंक' (१९४९) (१८९६), लंदन थियोसोफिकल सोसाइटी, में एक ही स्थान पर ५४ उपनिषदों के भावार्थ प्राप्त सीताराम शास्त्री और गंगानाथ झा (१८९८-१९०१), होते हैं।