१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६ खण्ड ७ मन्त्र ३ १६१ एवमेव खलु सोम्यान्नस्याश्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति तन्मनो भवति ॥ २ ॥ हे सोम्य ! ठीक इसी तरह अन्न को पूर्ण रूप से ग्रहण करने के पश्चात् उसका जो सूक्ष्मतम भाग एकत्रित होता है, वही ऊर्ध्व की ओर गमन करते हुए मन रूप में परिणत होता है ॥ २ ॥ अपा१५ सोम्य पीयमानानां योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति स प्राणो भवति ॥ ३ ॥ हे सोम्य ! पान किये हुए जल का जो सूक्ष्मतम भाग है, वही ऊपर आकर एकत्रित होता है। तत्पश्चात् वही ऊपर आया हुआ भाग प्राण तत्त्व के रूप में परिवर्तित हो जाता है ॥ ३ ॥ तेजसः सोम्याश्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति सा वाग्भवति ॥ ४ ॥ हे सोम्य ! इसी प्रकार ग्रहण किये हुए तेज का सूक्ष्मतम भाग सार रूप से ऊपर आ जाता है, वही वाणी के रूप में प्रकट होता है ॥ ४ ॥ अन्नमय१५हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ५ ॥ इस प्रकार उद्दालक ने श्वेतकेतु से कहा- हे प्रिय सोम्य ! मन अन्न के रूप में, प्राण जल के रूप में और वाणी तेजोमय रूप में है। तदनन्तर ऐसा श्रवण करते हुए श्वेतकेतु ने पुनः निवेदन किया- हे भगवन् ! कृपया आप मुझे पुनः समझाने की कृपा करें। इस पर उसके पिता ने बताने का पुनः आश्वासन दिया ॥ ५ ॥ ॥ सप्तमः खण्डः ॥ षोडशकलः सोम्य पुरुषः पञ्चदशाहानि माशीः काममपः पिबापोमयः प्राणो न पिबतो विच्छेत्स्यत इति ॥ १ ॥ (उद्दालक ने कहा) - हे सोम्य ! यह मनुष्य सोलह कलाओं से युक्त है। इसलिए तुम पन्द्रह दिन तक भोजन न ग्रहण करते हुए इच्छानुसार मात्र जल का ही सेवन करो। चूँकि प्राण, जल रूप है, अतः मात्र जल के सेवन से उस (प्राण) का नाश नहीं होगा ॥ १ ॥ स ह पञ्चदशाहानि नाशाथ हैनमुपससाद किं ब्रवीमि भो इत्यृचः सोम्य यजूं१षि सामानीति स होवाच न वै मा प्रतिभान्ति भो इति ॥ २ ॥ तदनन्तर श्वेतकेतु ने पंद्रह दिन तक भोजन नहीं ग्रहण किया। इसके बाद वह अपने पिता के समीप आकर बोला- हे भगवन् ! मैं क्या करूँ। तब उसके पिता आरुणि ने कहा- हे सोम्य ! तुम ऋक्, यजुः और साम के मन्त्रों का उच्चारण करो । उसने कहा- भगवन् ! मेरे मन में उन सभी की प्रतीति नहीं हो रही है ॥२ ॥ त१५ होवाच यथा सोम्य महतो ऽभ्याहितस्यैकोऽङ्गारः खद्योतमात्रः परिशिष्टः स्यात्तेन ततोऽपि न बहु दहेदेव१५सोम्य ते षोडशानां कलानामेका कलातिशिष्टा स्यात्तयैतर्हि वेदान्नानुभवस्यशानाथ मे विज्ञास्यसीति ॥ ३ ॥ तब उद्दालक ने कहा - हे सोम्य ! जैसे पर्याप्त परिमाण में ईंधन के प्रज्वलित होने पर आग का खद्योत के समान एक छोटा सा अंगारा शेष रह जाए, तो वह अधिक गर्मी नहीं प्रदान कर सकता। वैसे ही तुम्हारी षोडश (सोलह) कलाओं में से मात्र एक ही कला शेष है। इसलिए मात्र एक कला से तुम वेद का अध्ययन- अनुशीलन नहीं कर सकते हो। अतः अब तुम भोजन ग्रहण करो, तभी तुम्हारी समझ में आयेगा ॥ ३ ॥