भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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पृष्ठ 163

अध्याय ६ खण्ड ८ मन्त्र ७ १६३ आरुणि ने कहा- 'हे सोम्य! अब तुम क्षुधा और पिपासा के रहस्य को समझो'। जिस समय पुरुष भोजन ग्रहण करने की इच्छा करता है, उस समय खाये हुए भोजन (अन्न) को जल ही ले जाता है। जैसे गौ ले जाने वाले को गोनाय, अश्व ले जाने वाला अश्वानाय और पुरुष को ले जाने वाले राजा को पुरुषनाय कहते हैं। ठीक वैसे ही जल को भोजन (अशन) ले जाने के कारण 'अशनाय' कहकर बुलाते हैं। हे प्रिय सोम्य! उस जल के द्वारा ही तुम इस शरीर रूपी अङ्कुर को प्रकट हुआ समझो ॥ ३ ॥ तस्य क्व मूलं स्यादन्यत्रान्नादेवमेव खलु सोम्यान्नेन शुङ्गेनापो मूलमन्विच्छाद्भिः सोम्य शुङ्गेन तेजोमूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः ॥ ४ ॥ अन्न के अतिरिक्त इस शरीर का मूल और क्या है ? हे सोम्य ! तुम तेज को अन्न रूप कर्म का मूल समझो। तेजरूपी कार्य का मूल सत् तत्त्व को जानो। इस प्रकार से ये समस्त प्राणी सत् रूप मूल वाले ही हैं अर्थात् सत् ही एक मात्र आश्रय तथा प्रतिष्ठा है ॥ ४ ॥ अथ यत्रैतत्पुरुषः पिपासति नाम तेज एव तत्पीतं नयते तद्यथा गोनायोऽश्वनायः पुरुषनाय इत्येवं तत्तेज आचष्ट उदन्येति तत्रैतदेव शुङ्गमभ्युत्पतितं सोम्य विजानीहि नेदममूलं भविष्यतीति ॥ ५ ॥ जब मनुष्य पिपासित (प्यासा) होकर जल ग्रहण करता है, तब उस (जल) को तेज ही अन्दर ले जाता है। अतः जैसे 'गोनाय', 'अशनाय', 'पुरुषनाय' कहे गये हैं, ठीक वैसे ही तेज को उस समय जल को ले जाने वाला कहते हैं। हे सोम्य ! इस कारण से इस शरीर को जलरूपी मूल से प्रकट हुआ समझो, क्योंकि बिना क्रिया के प्रतिक्रिया नहीं हो सकती ॥ ५ ॥ [ शरीर की चयापचय प्रक्रिया (मैटाबालिज्म) में शरीर के प्रत्येक कोश तक अन्न को जल तथा जल को काय विद्युत् (बायो इलैक्ट्रीसिटी) द्वारा संचरित किये जाने का तथ्य वर्तमान शरीर विज्ञान स्वीकार कर चुका है। उसी प्रक्रिया को ऋषि अपने ढंग से समझा रहे हैं।] तस्य क्व मूलं स्यादन्यत्राद्भ्योऽद्भिः सोम्य शुङ्गेन तेजो मूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठा यथा नु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तदुक्तं पुरस्तादेव भवत्यस्य सोम्य पुरुषस्य प्रयतो वाङ्मनसि संपद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायाम् ॥ ६ ॥ हे प्रिय सोम्य ! जल द्वारा प्रकट हुए शरीर का मूल स्थान कहाँ हो सकता है ? जल का मूल तेज में और तेज का मूल सत् में होता है। ये सभी प्राणी सत् रूपी मूल वाले, सत् रूपी उद्गम स्थल वाले और सत् रूपी अत्र वाले हैं। हे सोम्य ! तीनों (अन्न, जल और तेजरूपी) देवता पुरुष के शरीर में प्रविष्ट होकर विभिन्न भागों में बँट जाते हैं। उद्दालक ने कहा- यह मैंने पूर्व में स्पष्ट कर दिया था। इसी कारण से मृत्यु के समीप पहुँचने वाले पुरुष की वाणी मन में लीन हो जाती है, मन प्राण में विलीन हो जाता है। प्राण तेज में और तेज परदेवता में मिल जाता है ॥ ६ ॥ स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ७ ॥