भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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पृष्ठ 166

१६६ छान्दोग्योपनिषद् ॥ द्वादशः खण्डः ॥ न्यग्रोधफलमत आहरेतीदं भगव इति भिन्द्धीति भिन्नं भगव इति किमत्र पश्यसीत्यण्व्य इवेमा धाना भगव इत्यासामङ्गैकां भिन्द्धीति भिन्ना भगव इति किमत्र पश्यसीति न किंचन भगव इति ॥ १ ॥ हे सोम्य ! इस सामने विद्यमान महान् वट वृक्ष से एक फल तोड़कर ले आओ। ऐसा सुनते ही वह (श्वेतकेतु) शीघ्रता से फल को ले आया। आरुणि ने पुनः कहा- 'इसे तोड़ दो।' तोड़ते हुए श्वेतकेतु बोला- 'भगवन् ! तोड़ दिया'। आरुणि ने कहा इसके अन्दर क्या दिखाई दे रहा है? श्वेतकेतु बोला- इसके भीतर ये अणु के सदृश दाने दिखाई दे रहे हैं। आरुणि ने फिर कहा- इन दानों में से एक को लेकर तोड़ दो। श्वेतकेतु बोला- भगवन् ! तोड़ दिया। आरुणि ने कहा कि 'इसके अन्दर क्या देखते हो?' श्वेतकेतु ने उत्तर दिया- हे भगवन् ! मुझे इसके अन्दर कुछ भी नहीं दिखाई पड़ रहा है ॥ १ ॥ तꣳ होवाच यं वै सोम्यैतमणिमानं न निभालयस एतस्य वै सोम्यैषोऽणिम्न एवं महान्न्यग्रोधस्तिष्ठति श्रद्धत्स्व सोम्येति ॥ २ ॥ तब उद्दालक ने कहा- हे सोम्य ! इस वट के बीज के अन्दर जिस अति सूक्ष्म अणु रूप को तुम नहीं देख सकते हो, उसमें इतना विशाल वृक्ष स्थिर है। अतः हे सोम्य ! मेरे द्वारा बताये हुए इस कथन पर श्रद्धापूर्वक विश्वास करो ॥ स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳ सर्वं तत्सत्यꣳ स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ हे सोम्य ! इस वट वृक्ष का जो यह अणु रूप है, तदनुरूप ही यह सब सूक्ष्म जगत् है। वही सत्य है और हे श्वेतकेतो ! वही तत्त्व तुम स्वयं हो। उद्दालक के ऐसा कहने पर श्वेतकेतु ने पुनः निवेदन किया- भगवन् ! कृपया मुझे फिर से बताने का अनुग्रह करें। तब उद्दालक ने उसे 'अच्छा' कहते हुए पुनः आश्वस्त किया ॥ ॥ त्रयोदशः खण्डः ॥ लवणमेतदुदकेऽवधायाथ मा प्रातरुपसीदथा इति स ह तथा चकार तꣳ होवाच यद्दोषा लवणमुदकेऽवाधा अङ्ग तदाहरेति तद्धावमृश्य न विवेद ॥ १ ॥ उद्दालक ने अपने पुत्र श्वेतकेतु को फिर से समझाते हुए कहा-'हे सोम्य ! इस पिण्ड रूपी नमक के टुकड़े को जल-पात्र में डालकर अगले दिन प्रातःकालीन वेला में पुनः उपस्थित होना।' ऐसा सुनकर अपने पिता के आदेशानुसार वह दूसरे दिन उपस्थित हुआ। तब उद्दालक ने कहा- हे पुत्र ! विगत रात्रि में जिस लवण को तुमने जल में मिश्रित किया था, 'उसे ले आओ।' परन्तु ढूंढने पर उस नमक को वह नहीं प्राप्त कर सका ॥ १ ॥ यथा विलीनमेवाङ्गास्यान्तादाचामेति कथमिति लवणमिति मध्यादाचामेति कथमिति लवणमित्यन्तादाचामेति कथमिति लवणमित्यभिप्रास्यैनदथ मोपसीदथा इति तद्ध तथा चकार तच्छश्वत्संवर्तते तꣳहोवाचात्र वाव किल सत्सोम्य न निभालयसेऽत्रैव किलेति ॥ २ ॥ हे सोम्य ! तुम इस जल में मिले हुए नमक के अंश को नहीं देख सकते हो, फिर भी यदि जिज्ञासा हो तो इस जल को ऊपर से लेकर आचमन के रूप में ग्रहण करो। आचमन के उपरान्त पिता द्वारा पूछने पर उसने कहा 'नमकीन' अर्थात् खारा है। पिता ने कहा कि अब जल पात्र के मध्य में से जल लेकर पीते हुए बताओ कैसा है? उसने फिर कहा