१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१७० छान्दोग्योपनिषद् इच्छानुसार गति हो जाती है। (नारद ने सनत्कुमार जी से कहा-) हे भगवन् ! क्या नाम के अतिरिक्त भी कुछ है ? सनत्कुमार ने कहा- हाँ नाम से भी अधिक है ? तब महर्षि नारद जी ने कहा - हे भगवन् ! तो फिर मुझे वही बताने की कृपा करें ॥ ५ ॥ ॥ द्वितीयः खण्डः ॥ वाग्वाव नाम्नो भूयसी वाग्वा ऋग्वेदं विज्ञापयति यजुर्वेदग्ं सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्यग्ं राशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्याग्ं सर्पदेवजनविद्यां दिवं च पृथिवीं च वायुं चाकाशं चापश्च तेजश्च देवाग्श्च मनुष्याग्श्च पशूग्श्च वयाग्ंसि च तृणवन - स्पतीञ्श्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलिकं धर्मं चाधर्मं च सत्यं चानृतं च साधु चासाधु च हृदयज्ञं चाहृदयज्ञं च यद्वै वाङ्नाभविष्यन्न धर्मो नाधर्मो व्यज्ञापयिष्यन्न सत्यं नानृतं न साधु नासाधु न हृदयज्ञो नाहृदयज्ञो वागेवैतत्सर्वं विज्ञापयति वाचमुपास्स्वेति ॥ १ ॥ (सनत्कुमार ने कहा-) वाणी नाम से अधिक श्रेष्ठ है, वाणी ही ऋग्वेद को प्रकाशित करती है। यजुर्वेद, सामवेद, चतुर्थ अथर्ववेद, पाँचवाँ वेद इतिहास-पुराण, वेदों के वेद व्याकरण, श्राद्धकल्प, गणित, उत्पात विज्ञान, नीतिशास्त्र, निधिज्ञान, तर्कशास्त्र, निरुक्त, वेद विज्ञान, भूतविद्या, धनुर्वेद, ज्योतिष , सर्पविद्या, संगीत-शिल्प आदि शास्त्र, द्युलोक, पृथिवी, वायु, आकाश, जल, तेज, देव, मानव, पशु-पक्षी, तृण-वनस्पति, हिंस्र जन्तु, कीट-पतंगे, चींटी आदि प्राणी, धर्म और अधर्म, सत्य एवं असत्य, साधु तथा असाधु, अच्छा एवं बुरा, प्रिय एवं अप्रिय आदि का ज्ञान वाणी द्वारा ही प्राप्त हो सकता है। वाणी ही इन सबको ज्ञापित करती है, इसलिए हे नारद ! तुम वाणी की ही उपासना करो ॥ १ ॥ स यो वाचं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद्वाचो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो वाचं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो वाचो भूय इति वाचो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ हे महर्षि नारद ! वह (साधक) जो वाणी को 'यह ब्रह्म है' ऐसा मानकर उस ब्रह्मरूप की उपासना करता है, उसकी जहाँ तक वाणी के विषय हैं, वहाँ तक इच्छानुसार गति होती है। (तब नारद ने कहा) हे योगेश्वर ! वाणी से भी अधिक कुछ है क्या ? (सनत्कुमार जी ने कहा)- हाँ है, वाणी से भी बढ़कर है। नारद ने कहा- भगवन् ! मुझे वही बताने की कृपा करें ॥२ ॥ ॥ तृतीयः खण्डः ॥ मनो वाव वाचो भूयो यथा वै द्वे वामलके द्वे वा कोले द्वौ वाक्षौ मुष्टिरनुभवत्येवं वाचं च नाम च मनोऽनुभवति स यदा मनसा मनस्यति मन्त्रानधीयीयेत्यथाधीते कर्माणि कुर्वीयेत्यथ कुरुते पुत्राग्श्च पशूग्श्चेच्छेयेत्यथेच्छत इमं च लोकममुं चेच्छेयेत्यथेच्छते मनो ह्यात्मा मनो हि लोको मनो हि ब्रह्म मन उपास्स्वेति ॥ १ ॥ योगेश्वर सनत्कुमार जी कहते हैं- 'मन' वाणी से अधिक श्रेष्ठ है। जिस तरह से दो आँवले, दो बेर अथवा दो बहेड़े मुट्ठी के अन्दर आ जाते हैं, उसी तरह वाणी और नाम की अनुभूति मन करता है। जिस समय मनुष्य मन से विचार करता है कि 'मंत्रों को पढूँ' उसी समय वह पढ़ता है। वह जब सोचता है कि