भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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२०० तैत्तिरीयोपनिषद ॥ पञ्चमोऽनुवाकः ॥ भूर्भुवः सुवरिति वा एतास्तिस्रो व्याहृतयः । तासामुह स्मैतां चतुर्थीं माहाचमस्यः प्रवेदयते। मह इति । तद्ब्रह्म। स आत्मा। अङ्गान्यन्या देवताः। भूरिति वा अयं लोकः । भुव इत्यन्तरिक्षम्। सुवरित्यसौ लोकः ॥ १॥ मह इत्यादित्यः। आदित्येन वाव सर्वे लोका महीयन्ते। भूरिति वा अग्निः। भुव इति वायुः। सुवरित्यादित्यः। मह इति चन्द्रमाः। चन्द्रमसा वाव सर्वाणि ज्योतीꣳषि महीयन्ते। भूरिति वा ऋचः। भुव इति सामानि। सुवरिति यजूंषि॥ २॥ मह इति ब्रह्म। ब्रह्मणा वाव सर्वे वेदा महीयन्ते। भूरिति वै प्राणः। भुव इत्यपानः। सुवरिति व्यानः। मह इत्यन्नम्। अन्नेन वाव सर्वे प्राणा महीयन्ते। ता वा एताश्चतस्रश्चतुर्धा । चतस्रश्चतस्रो व्याहृतयः। ता यो वेद। स वेद ब्रह्म। सर्वेऽस्मै देवा बलिमावहन्ति ॥ ३ ॥ भूः, भुवः, स्वः - ये तीन व्याहृतियाँ हैं। उनसे भिन्न जो चौथी व्याहृति महः है, जिसे सर्वप्रथम महाचमस के पुत्र ने जाना था। वह महः ही ब्रह्म है। वही ब्रह्म की आत्मा है। अन्य देवता उसके अंग हैं। भूः - यह व्याहृति पृथिवी लोक है। भुवः - यह व्याहृति अन्तरिक्ष लोक है। स्वः - यह व्याहृति स्वर्गलोक है। महः - आदित्य है। उस आदित्य से ही सम्पूर्ण लोक महिमा को प्राप्त होते हैं। भूः - यह व्याहृति ही अग्नि है। भुवः- यह व्याहृति वायु है। स्वः- यह व्याहृति आदित्य है। महः - यह व्याहृति चन्द्रमा है। चन्द्रमा से ही समस्त ज्योतियाँ महिमा को प्राप्त होती हैं। भूः - यह ऋग्वेद है। भुवः - यह सामवेद है। स्वः- यह यजुर्वेद है। महः- यह ब्रह्म है। ब्रह्म से ही समस्त वेद महिमा को प्राप्त होते हैं। भूः

  • यह प्राण है। भुवः- यह अपान है। स्वः- यह व्यान है। महः- यह अन्न है। अन्न से ही सभी प्राणों में बल संचार होता है। ये चारों व्याहृतियाँ चार प्रकार की हैं। एक-एक के चार-चार भेद होने से कुल सोलह व्याहृतियाँ होती हैं। इस प्रकार जो जानता है, वह ब्रह्म को जान लेता है। उस पुरुष के लिए सम्पूर्ण देवता अपने अनुदान प्रदान करते हैं॥ १-३॥ ॥ षष्ठोऽनुवाकः ॥ स य एषोऽन्तर्हृदय आकाशः। तस्मिन्नयं पुरुषो मनोमयः। अमृतो हिरण्मयः। अन्तरेण तालुके । य एष स्तन इवावलम्बते। सेन्द्रयोनिः । यत्रासौ केशान्तो विवर्तते। व्यपोह्य शीर्षकपाले। भूरित्यग्नौ प्रतितिष्ठति । भुव इति वायौ ॥ १ ॥ सुवरित्यादित्ये। मह इति ब्रह्मणि । आप्नोति स्वाराज्यम् । आप्नोति मनसस्पतिम् । वाक्पतिश्चक्षुष्पतिः । श्रोत्रपतिर्विज्ञानपतिः। एतत्ततो भवति। आकाशशरीरं ब्रह्म। सत्यात्म प्राणारामं मन आनन्दम् । शान्तिसमृद्धममृतम् । इति प्राचीनयोग्योपास्व ॥ २ ॥ इस हृदयस्थ आकाश भाग में, वह मनोमय अमृत स्वरूप, प्रकाश स्वरूप परम पुरुष प्रतिष्ठित है। दोनों तालुओं के बीच जो यह स्तन के समान लटक रहा है, (उसके ऊपर) जहाँ केशों का मूल भाग है। शीर्ष कपाल को भेदकर सुषुम्ना नाड़ी जाती है, वह (सहस्रार या ब्रह्मरंध्र) इन्द्र योनि है। निर्वाण काल में साधक भूः स्वरूप अग्नि में प्रतिष्ठित होता है। भुवः स्वरूप वायु में प्रतिष्ठित होता है। स्वः स्वरूप आदित्य
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