१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें॥ नादाबन्दूपानषद् ॥ यह उपनिषद् ऋग्वेद से सम्बद्ध है। इस उपनिषद् के प्रारम्भ में 'ॐकार' को हंस मानकर उसके विभिन्न अंगोपांगों का वर्णन किया गया है। फिर ॐ की १२ मात्राओं तथा उनके साथ प्राणों के विनियोग का फल कहा गया है। योगयुक्त साधक की स्थिति तथा ज्ञानी के प्रारब्ध कर्मों के क्षय का वर्णन करते हुए नाद के अनेक प्रकार तथा नादानुसंधान साधना का स्वरूप समझाया गया है। अंत में मन के प्रभावित होने, मन के लय होने तथा मनोलय की स्थिति का वर्णन किया गया है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ वाङ्मे मनसि........इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य- ऐतरेयोपनिषद्) ॐ अकारो दक्षिणः पक्ष उकारस्तूत्तरः स्मृतः । मकारं पुच्छमित्याहुरर्धमात्रा तु मस्तकम् ॥ १ ॥ ॐ कार रूप हंस का 'अकार' दक्षिण पक्ष (दाहिना पंख) तथा 'उकार' उत्तर पक्ष (बायाँ पंख) कहा गया है। उसकी पूँछ ही 'मकार' है और अर्धमात्रा ही उसका शीर्ष भाग है ॥ १ ॥ पादादिकं गुणास्तस्य शरीरं तत्त्वमुच्यते । धर्मोऽस्य दक्षिणं चक्षुरधर्मोऽथो परः स्मृतः ॥ २ ॥ उस (ॐ कार रूप हंस) के दोनों पैर रजोगुण एवं तमोगुण हैं और (उसका) शरीर सतोगुण कहा गया है। धर्म (उसका) दक्षिण चक्षु है और अधर्म बायाँ चक्षु (नेत्र) कहा गया है ॥ २ ॥ भूर्लोकः पादयोस्तस्य भुवर्लोकस्तु जानुनि । सुवर्लोकः कटीदेशे नाभिदेशे महर्जगत् ॥ ३ ॥ उस (हंस) के दोनों पैरों में भूः (पृथ्वी) लोक स्थित है। उसकी जंघाओं में भुवः (अन्तरिक्ष) लोक केन्द्रित है। स्वः (स्वर्ग-ऊर्ध्व) लोक उसके कटिप्रदेश तथा महः लोक उसके नाभि प्रदेश में स्थित है ॥ ३ ॥ जनोलोकस्तु हृद्देशे कण्ठे लोकस्तपस्ततः । भ्रुवोर्ललाटमध्ये तु सत्यलोको व्यवस्थितः ॥ ४ ॥ उसके हृदय स्थल में जनः लोक और कण्ठ प्रदेश में तपोलोक विद्यमान है। ललाट और भौंहों के मध्य में सत्य लोक स्थित है ॥ ४ ॥ सहस्रार्णमतीवात्र मन्त्र एष प्रदर्शितः । एवमेतां समारूढो हंसयोगविचक्षणः ॥ ५ ॥ न भिद्यते कर्मचारैः पापकोटिशतैरपि । आग्नेयी प्रथमा मात्रा वायव्येषा तथापरा ॥ ६ ॥ इस प्रकार से वर्णित सहस्रावयव युक्त प्रणवरूप हंस पर आसीन होकर कर्मानुष्ठान-ध्यान आदि में रत हंस योगी- विचक्षण पुरुष ओंकार की श्रेष्ठ विधि से मनन व चिन्तन करता हुआ सहस्रों-करोड़ों पापों से निवृत्त होकर मोक्ष पद को प्राप्त कर लेता है। (ॐकार के देवता अग्नि हैं। उसका स्वरूप भी अग्नि मण्डल जैसा है। 'अकार' नामक (प्रणव की) प्रथम मात्रा 'आग्नेयी' कही गयी है और ('उकार' नामक)