१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२० नादबिन्दूपनिषद् मकरन्दं पिबन्भृङ्गो गन्धान्नापेक्षते यथा। नादासक्तं सदा चित्तं विषयं न हि काङ्क्षति॥ ४२॥ जिस प्रकार भ्रमर फूलों का रस ग्रहण करता हुआ पुष्पों के गन्ध की अपेक्षा नहीं रखता है, ठीक वैसे ही सतत नाद में तल्लीन रहने वाला चित्त विषय-वासना आदि की आकांक्षा नहीं करता है॥ ४२॥ बद्धः सुनादगन्धेन सद्यः संत्यक्तचापलः। नादग्रहणतश्चित्तमन्तरङ्गभुजङ्गमः॥ ४३॥ यह चित्त रूपी अन्तरङ्ग भुजङ्ग (सर्प) नाद को सुनने के पश्चात् उस सुन्दर नाद की गन्ध से आबद्ध हो जाता है और तत्क्षण ही सभी तरह की चपलताओं का परित्याग कर देता है॥ ४३॥ विस्मृत्य विश्वमेकाग्रः कुत्रचिन्न हि धावति। मनोमत्तगजेन्द्रस्य विषयोद्यानचारिणः॥ ४४॥ नियामनसमर्थोऽयं निनादो निशिताङ्कुशः। नादोऽन्तरङ्गसारङ्गबन्धने वागुरायते॥ ४५॥ अन्तरङ्गसमुद्रस्य रोधे वेलायतेऽपि वा। ब्रह्मप्रणवसंलग्ननादो ज्योतिर्मयात्मकः॥ ४६॥ तदनन्तर (वह मन) विश्व (सांसारिकता) को विस्मृत करके तथा एकाग्रता को धारण करके (विषयों में) इधर-उधर कहीं भी नहीं दौड़ता है। विषय-वासना रूपी उद्यान में विचरण करने वाले मन रूपी उन्मत्त गजेन्द्र को वश में करने में यह नादरूपी अति तीक्ष्ण अङ्कुश ही समर्थ होता है। यह नाद मनरूपी हिरण को बाँधने में जाल का कार्य करता है और मन रूपी तरङ्ग को रोकने में तट का काम करता है। ब्रह्मरूप प्रणव में संयुक्त हुआ यह नाद स्वयं ही प्रकाश स्वरूप होता है॥ ४४-४६॥ मनस्तत्र लयं याति तद्विष्णोः परमं पदम्। तावदाकाशसंकल्पो यावच्छब्दः प्रवर्तते॥ ४७॥ मन वहाँ ही (उस प्रकाश तत्त्व में) विलय को प्राप्त हो जाता है। वहीं परम श्रेष्ठ भगवान् विष्णु का परम पद है। मन में आकाश तत्त्व का संकल्प तभी तक रहता है, जब तक कि शब्दों का उच्चारण और श्रवण होता है॥ ४७॥ निःशब्दं तत्परं ब्रह्म परमात्मा समीयते । नादो यावन्मनस्तावन्नादान्तेऽपि मनोन्मनी॥ ४८॥ निःशब्द (शब्दरहित) होने पर तो वह (मन) परमब्रह्म के परमात्म-तत्त्व का अनुभव करने लगता है। नाद (ध्वनि) के रहने तक ही मन का अस्तित्व बना रहता है। नाद के समापन होने पर मन भी 'अमन' (शून्यवत्) हो जाता है॥ ४८॥ सशब्दश्चाक्षरे क्षीणे निःशब्दं परमं पदम्। सदा नादानुसंधानात्संक्षीणा वासना तु या॥ ४९॥ निरञ्जने विलीयेते मनोवायू न संशयः। नादकोटिसहस्राणि बिन्दुकोटिशतानि च॥ ५०॥